Category: कौशलेंद्र प्रपन्न

रिश्तों के पायदान पर

गठबंधन इन दिनांे लगा हूं समझने में रिश्तों का समीकरण रिश्तों की फुसफुसाहट गठबंधन संबंधों का। धीमे कदमों से चलता हूं रिश्तों के पायदान पर फिर कुछ आहटें कुछ …

तुम से मिलता हूं गोया जहां पूरा समा जाता हो

पहाड़ से मिलता हूं मिलता हूं जंगल से भी। जब भी गले लगाया किसी मोटे बिरिछ को तो लगा तुम्हीं में समा गया गोया। काले थे या गोरे रंग …

तुम्हारे पास समंदर था और मेरे पास पहाड़ दादू

तुम्हारे पास समंदर था सो मचलते रहे ताउम्र मेरे पास पहाड़ था, सो भटकता रहा मोड़ मुहानों से ताउम्र। तुम्हारे पास समंदर की लहरें थीं खेलने उलीचने को जो …

षब्द क्यों छूछे लग रहे

सारे षब्द क्यों छूछे लग रहे हैं क्यों सारी भावनाएं उधार सी लग रही हैं सेचता हूं तुम्हारे लिए कोई टटका षब्द दूं उसी षब्द से पुकारूं मगर सारे …

आंगन कहां है अम्मा

आंगन कहां है अम्मा घर भर में एक आंगन ही हुआ करता था जहां अम्मा बैठाकरती थीं अंचरा में बायन लेकर रखा करती थीं हाथ में बायन तोड़ तोड़कर …

पोटली बांध दी है पहाड़ की चोटी में

मेरा जो भी दुख था या जिसे कहते हैं सुख एक पोटली बना कर बांध दी है उस सामने वाले पहाड़ की चोटी में। हां वही पहाड़ जो रहता …

तुम्हारे समंदर को मीठा बना दूं

तुम्हारे समंदर को मीठा बना दूं घोल कर प्रीत की ढली उलीच डालूं तुम्हारे खारेपन, भर दूं आकंठ मुहब्बत की तासीर तुम्हारे खालीपन में बो दूं दूब संगी की …

तेरे शहर से

उम्मीदों भरे तेरे शहर से नाउम्मीदों की पेाटली बांधे निकल पड़ा उस पार खेत यहीं रह गए रह गई तेरी उम्मीदों के स्वर बस मैं चलता हूं तेरे उम्मीदों …

बस ज़रा प्यास से

किसी दिन जिंदगी का लैपटाॅप यूं ही खुला रह गया और मैं चला गया दूर कहीं किसी भूगोल में सोचो कैसे खोल पाओगे मेरी जिंदगी का लैपटाॅप सारा का …

अच्छा ही हुआ तुम मर गए

अच्छा हुआ अच्छा ही हुआ तुम मर गए समय रहते, तुम वैसे भी जिंदा रह कर जी न पाते। जब देखना पड़ता हजारों बच्चों की मौत, इन्हीं आंखों से …

कविता कहानी से क्या होगा हासिल

रोज दिन हर पल नई नई कविताएं लिखी जा रही हैं। विश्व की तमाम भाषाओं में कविता लिखी जा रही है। जिस रफ्तार से कविताएं लिखी जा रही हैं …

जब हमी नहीं होंगे तो किससे लड़ोगे

जब हमी नहीं होंगे जब हमी नहीं होंगे तो किससे लड़ोगे, हर सुबह, चाय से लेकर नहाने तक, आॅफिस पहंुच कर किससे करोगे शिकायत, कि दुध क्यों नहीं पीया …

सरयू की याद में खासकर 6 दिसंबर पर

सरयू की याद में खासकर 6 दिसंबर पर आस्था का मलबा विश्वास को ढाह कर चैन की नींद ली सरयू को किया लाल और जयजयकार किया हमने। बरसों की …

हम भी हैं कतार में

जिसे देखो वही कतार में खड़ा अपनी पारी का करता इंतज़ार रहा, उम्र गुज़र गई, आस वहीं की वहीं लटकी रही। हवा भी इतज़ार में मकान कुछ नीचे हों …

ख़तरनाक !

डांट नहीं, प्यार भी नहीं, मनुहार भी नहीं, वार भी नहीं। ख़तरनाक- लटका हुआ लोर, अटकी हुई बहस, टंगी हुई सांस टूटता विश्वास। ख़तरनाक- मां का रोना, बहन की …

देवता घर

दीपावली की शुभकामनाएं। परिवार में समृद्धि और खुशियां बनी रहे इसी कामना के साथ एक छोटी सी अभिव्यक्ति प्रस्तुत है। इस बरस देवता घर नहीं खुला, नहीं जोरा दीया, …

चांद परेशां क्यों

चांद परेशां क्यों क्यों हो चांद परेशां, तन्हा भी हो क्यों, रात रात भर अकेले आंसू बहते हो। सुबह दिखती हैं ओसों में, निशा बुलाती है बड़ी दीदी सुनाती …