Category: कर्मानंद आर्य

घायल देश के सिपाही (इरोम शर्मिला के लिए : जिसने मृत्यु का मतलब जान लिया है)

लड़ रही हूँ की लोगों ने लड़ना बंद कर दिया है एक सादे समझौते के खिलाफ कि “क्या फर्क पड़ता है” मेरी आवाज तेज और बुलंद हुई है इन …

कोई जालिम भूख उन्हें खा जायेगी!

द्वीप के उस हिस्से में जहाँ मैं बड़ा हुआ चीलें मंडरा रहीं हैं घरों के आस-पास वे चीलें जिनके पंजे लोहे से बने हैं जिनकी चोंचो की धार में …

तुमने कभी सोचा सूखे तपे पहाड़ों का दुःख

मेरे जिस्म से निकलने वाली नदियों समय के क्रूर पत्थरों अस्मिता की अँधेरी गलियों में भटकने वाली दलित आत्माओं बाहर निकलो उन्होंने हमें सच का प्रलोभन दिया है छीना …

ओ दलित बेटियों

ओ सांवली धरती दो उभारों के बीच चलने वाली तुम्हारी नर्म सांसे पछाह धान का चिउरा कूटती जवान लडकियों की साँसों से थोड़ा तेज धड़क रही हैं तुम्हारी चौहद्दी …

अर्थी उठाने वाले मेरे खुरदरे हाथ

अर्थी उठाने वाले मेरे खुरदरे हाथ / डॉ. कर्मानंद आर्य हँसो जितना हँस सकते हो मुझसे उतनी ही नफरत करो जितनी मौत से मुझे कविता से प्रेम नहीं नहीं …

आधुनिक एकलव्य कथा

आधुनिक एकलव्य कथा / डॉ. कर्मानंद आर्य तो क्या-क्या बताऊँ महाराज! असगुन कथा सी लम्बी उसांस भारती है कंक्रीट मेरा जन्मना है एक पथभ्रस्ट शहर की तरह जो देखने …

तीन स्मृतियाँ

तीन स्मृतियाँ / डॉ. कर्मानंद आर्य समय के सहचर मेरे तीन गुरू, माता पिता आचार्य स्कूल जाते हुए मेरे पिता ने पहली शिक्षा दी तुम्हे कोई जाति सूचक शब्द …

डॉ. कर्मानंद आर्य की कवितायेँ

उनके घर का पानी मत पीना / डॉ. कर्मानंद आर्य तीन हजार साल पहले मेरे पूर्वज नहीं गांठते थे जूते नहीं करते थे बेगारी वो दास नहीं थे, न …