Category: कंवर करतार ‘खंदेह्ड़वी’

ईश्वर का वरदान है बेटी I

ईश्वर का वरदान है बेटी I कुदरत का एहसान है बेटी I कहो कभी न महमान है बेटी मधुर रिश्तों की जान है बेटी मेरी हो चाहे तेरी हो …

ग़ज़ल-(मात्रिक वहर )

सरकारी माल का निजी इस्तेमाल तो आम हो गया है I गाड़ी कंप्यूटर तो मानो उन के नाम हो गया है II मानव की फितरत से ही तो पर्वत …

कलम पर एक मुसलसल ग़ज़ल

झूठ पर से पर्दा उठाती है कलमI आयना सच्च का दिखाती है कलमII जिन्दां की जुल्मत में मुज़तर हो चाहे, नये जीस्त की शरर जलाती है कलमI सितमगर हो …

माँ-(शब्दाँजली)

माँ तुम तो मेरे तन मन में तेरी यादें घर के कण कण मेंI हुआ अकेला चाहे फिर भी कभी लगा नहीं मैं निर्जन मेंI मैं मुस्काया तू हँसी …

मेरी उलझन को सुलझाओ तुम –

इस ओर रहूँ कि उस छोर गहूँ, मेरी उलझन को सुलझाओ तुमI चहुँ ओर बिजलियाँ मेघ घनेरे, उद्विग्न उच्छृंखल मन को मेरे, जाग्रत उद्यत निर्भय निर्मल कर दिव्य राह …

धौलाधार शत शत मेरा तुम्हें नमन

तू गौरवमयी विशाल अचल चिंदी चिंदी सी हुई ओढ़े बर्फ की चादर जब लश्कें भानु शशि तेरे खखरे तन पर दिखता आवरण धवल धवल साँसे रोकता अपलक आरोहण पग …

हम सब भिखारी हैं –

कोई अस्त्र दिखा कर कोई बल से डरा कर कोई जाल में फंसा कर इन्सान से कोई कुच्छ माँगता है कभी कुच्छ माँगता है कभी मन मसोस कर कोई …

किन्नौर स्मृति -भाव चित्र-5 स्वर्ग सी सुन्दर वादियाँ हैं —

स्वर्ग सी सुंदर वादियाँ हैं, यहाँ टोहते साहस पहाड़ I किन्नर कैलाश की छाया में, करे क़ुदरत जहां श्रृंगार I बर्फ़ बृक्ष बागान कहीं, झर झर झरते झरनेI ठिठकें …

किन्नौर स्मृति -भाव चित्र-4 त्रंडा ढांक-

लम्ब तडंग सी खड़ी वो वाम तट पर शताद्रु के मीलों दुर्गम चट्टान है होसले को टोहती कठोर त्रंडा ढांक है टक-टक टान्कियों से सीना उसका चाक कर सड़क …

किन्नौर स्मृति -भाव चित्र-3 ढांक से उतरती एक अप्सरा सी –

ढांक की सर्पीली पगडंडी से मखमली टोपी सिर पर पहने सेबों जैसे सुंदर गाल पहाड़ी नदी के जल सी मस्त उच्छृंखल चाल लाल सुनहरी सेबों भरा पीठ पर बांधे …

किन्नौर स्मृति -भाव चित्र -2 प्रकृति का अजर है अमिट है यौवन ललाम –

करते बंधन मजबूर हो कर अपनों से दूर मीठी मीठी यादों को बना के कहार हिलोरें मन लेता उच्छ्वास भर लेता तभी नयनों को भातीं दिल को लुभातीं चट्टानों …

किन्नौर स्मृति-भाव चित्र -1 पत्थर की मौत

वह रास्ता आम नहीं पर है कुछ ख़ास पत्थर गड़गड़ाते लुढ़कते रहते हैं जिस पर दिन रात तू क्यों चला है उस राह पर वहां पत्थर ही सब कुछ …

ग़ज़ल-सराबों में पानी कोई क्या ढ़ूंढ़ता है —

सराबों में पानी कोई क्या ढूंढता है I हो सौदाई सा कोई क्यों घूमता है II अपनी आँखें आज भी भर आती हैं, हाल उनका जो हम से कोई …

ग़ज़ल-सज संवर अंजुमन में वे अगर जाएंगे —

सज संवर अंजुमन में वे अगर जाएंगे I नूर परियों के चेहरे तो उतर जाएंगेII जो थमा देंगे लहरों को दामन कभी, गहरे सागर में वो भी उतर जाएंगे …

ग़ज़ल-मुहब्बत की दास्तां जो भुलाई न गई —

मुहब्बत की दास्तां जो भुलाई न गईI उनको पाने की हसरत मिटाई न गईII इक हूक सी उठती है जो सीने में, किसी दवाई से भी जो दबाई न …

भांगड़ गधा –

मैं भौचक्का रह गया जब देखा – भांग खाता एक गधा मुँह से सहज ही निकला अरे! यह क्या? वह खाते खाते रुका कान खड़े कर के देखा मुझे …

झूठा नकाव ठग जाता है सच्च को –

पुस्तों से खींचते/धकेलते जीवन ठेले को धूप ठंड से वेखबर पसीने से तरवतर सिंचती उगती बढती उलझी सी बूढ़ी होती दाढ़ी और झुकती मूंछों से युक्त असामयिक झुरियों भरा …

मन को कुलांचें भरने दो-

अन्तस्‌ की प्रभा प्रछ्न्न अभी मन को रास रचने दो नहीं बंधेगा हिमालय से भी इसे कुलांचे भरने दो । पलकें खुली पर तम में अंधराता प्रमत नींद में …

स्वामी भक्त कुत्ता –

पूंछ हिलाता हर समय घूमता रहता है इर्द गिर्द अपने स्वामी के कुछ पाने की चाह में या चलता रहता है साथ -साथ किसी भी झाड़ी बृक्ष चट्टान या …

उनके यहाँ –

जो लोमड़ी सी जुबान रखते हैं गिद्ध सी होती है जिनकी नज़र और बन्दर की तरह बाँट किया करते हैं वे मदारी बन नचाते हैं जमाने को उनके यहाँ …

प्रतिपादन की आतप से –

अलोकित तन्त्र से संचालित कुणीत व्यबस्था -आभासित सुंदर में कितने ही हो चुके हैं पुतले से उसमें ग्रसित भटकते धमनियों में है जिनके स्पन्दन क्रन्दन करता गर्म लहू पर …

परिबर्तन की आकांक्षा-

मलिन बस्तियों में टूटी खाटों पर सोते सुसताते काले फूटे एलुमिनियम के बर्तनों में खाते मैले कुचैले चिथड़ों में लिप्त गर्मी सर्दी से असम्बेद्नशील हुई धूल व पसीनें से …

बौना होता आदमी –

आम आदमी दिन ब दिन बौना हो रहा है गर्दन और सर उसके धंस रहे हैं दोनों कंधों के बीच अपनी आकांक्षाओं और सम्बेदनाओं की अर्थी को अशक्त रीढ़ …

मैं इन्तज़ार में हूँ –

चारों ओर धुंध ही धुंध नव धरा सब अस्तित्व हीन केवल है अविरल धुंध मैं अपने कमरे में बैठा नन्हें दीप के प्रकाश में अपने आप को देख सकता …