Category: कमलेश भट्ट ‘कमल’

समन्दर में उतर जाते हैं

समन्दर में उतर जाते हैं जो हैं तैरने वाले किनारे पर भी डरते हैं तमाशा देखने वाले   जो खुद को बेच देते हैं बहुत अच्छे हैं वे फिर …

वृक्ष अपने ज़ख्म आखिर

वृक्ष अपने ज़ख्म आखिर किसको दिखलाते पत्तियों के सिर्फ पतझड़ तक रहे नाते।   उसके हिस्से में बची केवल प्रतीक्षा ही अब शहर से गाँव को खत भी नहीं …

मुश्किलों से जूझता

मुश्किलों से जूझता लड़ता रहेगा आदमी हर हाल में ज़िन्दा रहेगा।   मंज़िलें फिर–फिर पुकारेंगी उसे ही मंज़िलों की ओर जो बढ़ता रहेगा।   आँधियों का कारवाँ निकले तो …

मन स्वयं को दूसरों पर होम कर दे

मन स्वयं को दूसरों पर होम कर दे माँ हमारी भावना तू व्योम कर दे ! ज्योति है तू ज्योत्सना का वास तुझमें फिर अमावस से विलग तम तोम कर …

भले ही मुल्क के

भले ही मुल्क के हालात में तब्दीलियाँ कम हों किसी सूरत गरीबों की मगर अब सिसकियाँ कम हों। तरक्की ठीक है इसका ये मतलब तो नहीं लेकिन धुआँ हो, …

बेशक छोटे हों लेकिन

बेशक छोटे हों लेकिन धरती का हिस्सा हम भी हैं जैसे प्रभु की सारी रचना, वैसी रचना हम भी हैं। इतना भी आसान नहीं है पढ़ना और समझ पाना …

बहुत मुश्किल है कहना

बहुत मुश्किल है कहना क्या सही है क्या गल़त यारो है अब तो झूठ की भी, सच की जैसी शख्स़ियत यारो। दरिन्दों को भी पहचाने तो पहचाने कोई कैसे …

बनाए घर गरीबों के

बनाए घर गरीबों के, अमीरों के बहुत कम घर बने हैं राजगीरों के।   उन्हें अपने-पराये से भी क्या मतलब सभी घर, घर हुआ करते फ़कीरों के।   कोई …

प्यार, नफ़रत या गिला

प्यार, नफ़रत या गिला है, जानते हैं आपकी नीयत में क्या है, जानते हैं।   अपनी तो कोशिश है सच ज़िन्दा रहे, बस सच बयाँ करना सज़ा है, जानते …

पेड, कटे तो छाँव कटी फिर

पेड, कटे तो छाँव कटी फिर आना छूटा चिड़ियों का आँगन आँगन रोज, फुदकना गाना छूटा चिड़ियों का   आँख जहाँ तक देख रही है चारों ओर बिछी बारूद …

पिंजरें में कैद पंछी

पिंजरें में कैद पंछी कितनी उड़ान लाते अपने परों में कैसे वो आसमान लाते। काग़ज़ पे लिखने भर से खुशहालियाँ जो आतीं अपनी ग़ज़ल में हम भी हँसता सिवान …

नाउमीदी में भी गुल

नाउमीदी में भी गुल अक्सर खिले उम्मीद के जिसने चाहे, रास्ते उसको मिले उम्मीद के।   जोड़ने वाली कोई क़ाबिल नज़र ही चाहिए हर तरफ बिखरे पड़े हैं सिलसिले …

देह के रहते ज़माने की

देह के रहते ज़माने की कई बीमारियाँ भी हैं आदमी होने की लेकिन हममें कुछ खुद्दारियाँ भी हैं। कोई भी खुद्दार अपनी रूह का सौदा नहीं करता और करता …

टूटते भी हैं‚ मगर देखे

टूटते भी हैं‚ मगर देखे भी जाते हैं स्वप्न से रिश्ते कहाँ हम तोड़ पाते हैं।   मंज़िलें खुद आज़माती हैं हमें फिर फिर मंज़िलों को हम भी फिर …