Category: काका हाथरसी

अनुशासनहीनता और भ्रष्टाचार

बिना टिकट के ट्रेन में चले पुत्र बलवीर जहाँ ‘मूड’ आया वहीं, खींच लई ज़ंजीर खींच लई ज़ंजीर, बने गुंडों के नक्कू पकड़ें टी. टी. गार्ड, उन्हें दिखलाते चक्कू …

भ्रष्टाचार

राशन की दुकान पर, देख भयंकर भीर ‘क्यू’ में धक्का मारकर, पहुँच गये बलवीर पहुँच गये बलवीर, ले लिया नंबर पहिला खड़े रह गये निर्बल, बूढ़े, बच्चे, महिला कहँ …

कुछ तो स्टैंडर्ड बनाओ

प्रकृति बदलती छण-छण देखो, बदल रहे अणु, कण-कण देखो| तुम निष्क्रिय से पड़े हुए हो | भाग्य वाद पर अड़े हुए हो| छोड़ो मित्र ! पुरानी डफली, जीवन में परिवर्तन …

पंचभूत

भाँड़, भतीजा, भानजा, भौजाई, भूपाल पंचभूत की छूत से, बच व्यापार सम्हाल बच व्यापार सम्हाल, बड़े नाज़ुक ये नाते इनको दिया उधार, समझ ले बट्टे खाते ‘काका ‘ परम …

सुरा समर्थन

भारतीय इतिहास का, कीजे अनुसंधान देव-दनुज-किन्नर सभी, किया सोमरस पान किया सोमरस पान, पियें कवि, लेखक, शायर जो इससे बच जाये, उसे कहते हैं ‘कायर’ कहँ ‘काका’, कवि ‘बच्चन’ …

घूस माहात्म्य

कभी घूस खाई नहीं, किया न भ्रष्टाचार ऐसे भोंदू जीव को बार-बार धिक्कार बार-बार धिक्कार, व्यर्थ है वह व्यापारी माल तोलते समय न जिसने डंडी मारी कहँ ‘काका’, क्या …

हिंदी की दुर्दशा

बटुकदत्त से कह रहे, लटुकदत्त आचार्य सुना? रूस में हो गई है हिंदी अनिवार्य है हिंदी अनिवार्य, राष्ट्रभाषा के चाचा- बनने वालों के मुँह पर क्या पड़ा तमाचा कहँ …

दहेज की बारात

जा दिन एक बारात को मिल्यौ निमंत्रण-पत्र फूले-फूले हम फिरें, यत्र-तत्र-सर्वत्र यत्र-तत्र-सर्वत्र, फरकती बोटी-बोटी बा दिन अच्छी नाहिं लगी अपने घर रोटी कहँ ‘काका’ कविराय, लार म्हौंड़े सों टपके …

कालिज स्टूडैंट

फादर ने बनवा दिये तीन कोट¸ छै पैंट¸ लल्लू मेरा बन गया कालिज स्टूडैंट। कालिज स्टूडैंट¸ हुए होस्टल में भरती¸ दिन भर बिस्कुट चरें¸ शाम को खायें इमरती। कहें …

पक्के गायक

तंबूरा ले मंच पर बैठे प्रेमप्रताप । साज़ मिले पंद्रह मिनट. घंटाभर आलाप ॥ घंटाभर आलाप, राग में मारा गोता । धीरे-धीरे खिसक चुके थे सारे श्रोता ॥ कहें …

व्यंग्य एक नश्तर है

व्यंग्य एक नश्तर है ऐसा नश्तर, जो समाज के सड़े-गले अंगों की शल्यक्रिया करता है और उसे फिर से स्वस्थ बनाने में सहयोग भी। काका हाथरसी यदि सरल हास्यकवि …

रामा-रामा हरे-हरे

भजन-कीर्तन का इस युग में बदल चुका है ढर्रा। चरणामृत की जगह देश में चरता देशी ठर्रा। जिसे पी के, हज़ारों नर-नार, भवसागर से तरे। हरे रामा, हरे रामा, …

मॉर्डन रसिया

असली माखन कहाँ आजकल ‘शार्टेज’ है भारी चरबी वारौ ‘बटर’ मिलैगो फ्रिज में, हे बनवारी आधी टिकिया मुख लिपटाय जइयो बुलाय गई राधा प्यारी कान्हा, बरसाने में आय जइयो …