Category: जितेन्द्र ‘जौहर’

तब और अब

हरी, हरजिन्दर, हैरी और हबीब रहते थे इक-दूजे के बेहद क़रीब! बड़ी जमती थी उनकी गंगा-जमुनी टोली, एक-साथ मनाते थे ईद-बैसाखी-क्रिसमस-होली! मगर आज उनके अंन्दाज़ बिल्कुल बदल गये हैं ; …

उजाले की जीत

मुख़ालिफ़ हवाओं के बीच आसान नहीं होता, अँधेरे की महफ़िल में रौशनी लिखना! मगर वो नन्हा-सा दिया रातभर लिखता रहा पुरहौस… रोशनी की इबारत अँधेरे की छाती पर। हवाएँ, …

चिमनियों के काव्य-चित्र

कारख़ानों की धुआँ उगलती चिमनियाँ… जैसे कोई कलमुहाँ कम्पाउण्डर लगा रहा हो निरंतर ज़हरीले इंजेक्शन वात के गात में! धुआँ उगलती चिमनियाँ… जैसे कोई अँधेरे का सौदागर विकास के …

भूख

कुत्ते को रोटी खिलाता देखकर एक बूढ़े भिखारी ने साहब के आगे अपना हाथ फैलाया याचनापूर्वक गिड़गिड़ाया! तभी साहब ने मुँह खोला और भिखारी को टरकाते हुए बोला- “जानते …

वाह! क्या ख़ूब! उपलब्धियाँ मित्रवर!

वाह! क्या ख़ूब! उपलब्धियाँ मित्रवर! चाँद पर बस रहीं, बस्तियाँ मित्रवर! भूख से मर गया वो तड़पता हुआ, लाश पर सिक रहीं, रोटियाँ मित्रवर! रोशनी तो बहुत की जलाकर …

इतनी ऊँची उड़ान तक पहुँचे!

इतनी ऊँची उड़ान तक पहुँचे! भूमि से आसमान तक पहुँचे! थोड़ा सम्मान क्या मिला तुमको, यार! तुम तो गुमान तक पहुँचे! हाथ गीता-क़ुरान पर लेकिन, होंठ झूठे बयान तक …

वो सफ़र

हम अहिंसा के शुभ गीत गाते रहे, पंथ हिंसा का तुमने न छोड़ा मगर! कितने दीपक बुझे हैं तुम्हें क्या पता, कितनी माँगों का सिंदूर है लापता! युद्ध की …

चुनावी मौसम

फिर चुनाव का मौसम आया, इश्तियहार आये! आकर्षक मनभावन वादे, बेशुमार आये! गली-गली चौखट चौराहे पर लटके वादे। एकनिष्ठ हो सभी निशाना वोटों पर साधे। हंस-वेश में बग़ुले काफी, …

उलझा हुआ सवेरा है

आज निराशाओं ने डाला, द्वार-द्वार पर डेरा है। देव! नवल आलोक जगा दो, छाया घोर अँधेरा है। ख़ुद अपनी ही क़बर खोदता, खड़ा मनुज निज हाथों से। फूलों का …

हमारा दौर : कुछ चित्र

काल-वक्ष पर टाँक रहे हो, कायरता के मंज़र जैसे! बाहर से हलचलविहीन पर, भीतर एक बवंडर जैसे! क्रोध-ज्वार मुट्‌ठी में भींचे, साहस थर-थर काँप रहा है। ध्वनिविहीन विप्लव का …

बँटवारा : कुछ दृश्य

बेटों ने आँगन में इक, दीवार खड़ी कर दी; पिता बहुत हैरान, उधर महतारी सिसक रही! बड़कू बोला- ‘अम्मा के, सारेऽऽऽ गहने लेंगे!’ मझला पूछे- ‘बगिया वाला, खेत किसे …

अम्मा: दुर्दशा के दृश्य

रोज़ी-रोटी मिली शहर में, कुनवा ले आया। बड़ी बहू को रास न आया, अम्मा का साया। ये कह-कहकर अम्मा पे, गुर्राय घड़ी-घड़ी। ‘कौन बनाके दे बुढ़िया को, चाय घड़ी-घड़ी?’ …

बेटे की विदाई

अम्मा ने आटे के नौ-दस, लड्डू बाँध दिये; बोलीं- ‘रस्ते में खा लेना, लम्बी दूरी है।’ ठोस प्रेम का तरल रूप, आँखों से छलकाया। माँ की ममता देख कलेजा, …