Category: जाँ निसार अख़्तर

हर लफ़्ज़ तिरे जिस्म की खुशबू में ढला है

हर लफ़्ज़ तिरे जिस्म की खुशबू में ढला है ये तर्ज़, ये अन्दाज-ए-सुख़न हमसे चला है अरमान हमें एक रहा हो तो कहें भी क्या जाने, ये दिल कितनी …

हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे

हर एक रूह में एक ग़म छुपा लगे है मुझे ये ज़िन्दगी तो कोई बद-दुआ लगे है मुझे जो आँसू में कभी रात भीग जाती है बहुत क़रीब वो …

हम से भागा न करो दूर

हम से भागा न करो दूर ग़ज़ालों की तरह हमने चाहा है तुम्हें चाहने वालों की तरह ख़ुद-ब-ख़ुद नींद-सी आँखों में घुली जाती है महकी महकी है शब-ए-ग़म तेरे …

हमने काटी हैं तिरी याद में रातें अक्सर

हमने काटी हैं तिरी याद में रातें अक्सर दिल से गुज़री हैं सितारों की बरातें अक्सर और तो कौन है जो मुझको तसल्ली देता हाथ रख देती हैं दिल …

सौ चांद भी चमकेंगे

सौ चांद भी चमकेंगे तो क्या बात बनेगी तुम आये तो इस रात की औक़ात बनेगी उन से यही कह आये कि हम अब न मिलेंगे आख़िर कोई तक़रीब-ए-मुलाक़ात …

सुबह के दर्द को

सुबह के दर्द को रातों की जलन को भूलें किसके घर जायेँ कि उस वादा-शिकन को भूलें आज तक चोट दबाये नहीं दबती दिल की किस तरह उस सनम-ए-संगबदन …

वो आँख अभी दिल की कहाँ बात करे है

वो आँख अभी दिल की कहाँ बात करे है कमबख़्त मिले है तो सवालात करे है वो लोग जो दीवाना-ए-आदाब-ए-वफ़ा थे इस दौर में तू उनकी कहाँ बात करे …

रुखों के चांद, लबों के गुलाब मांगे है

रुखों के चांद, लबों के गुलाब मांगे है बदन की प्यास, बदन की शराब मांगे है मैं कितने लम्हे न जाने कहाँ गँवा आया तेरी निगाह तो सारा हिसाब …

रही है दाद तलब उनकी शोखियां

रही है दाद तलब उनकी शोख़ियाँ हमसे अदा शनास तो बहुत हैं मगर कहाँ हमसे सुना दिये थे कभी कुछ गलत-सलत क़िस्से वो आज तक हैं उसी तरह बदगुमाँ …

मौज-ए-गुल मौज-ए-सबा

मौज-ए-गुल, मौज-ए-सबा, मौज-ए-सहर लगती है सर से पा तक वो समाँ है कि नज़र लगती है हमने हर गाम सजदों ए जलाये हैं चिराग़ अब तेरी राहगुज़र राहगुज़र लगती …

फ़ुरसत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारो

फ़ुरसत-ए-कार फ़क़त चार घड़ी है यारों ये न सोचो के अभी उम्र पड़ी है यारों अपने तारीक मकानों से तो बाहर झाँको ज़िन्दगी शम्मा लिये दर पे खड़ी है …

पूछ न मुझसे दिल के फ़साने

पूछ न मुझसे दिल के फ़साने इश्क़ की बातें इश्क़ ही जाने वो दिन जब हम उन से मिले थे दिल के नाज़ुक फूल खिले मस्ती आँखें चूम रही …

तमाम उम्र अज़ाबों का

तमाम उम्र अज़ाबों का सिलसिला तो रहा ये कम नहीं हमें जीने का हौसला तो रहा गुज़र ही आये किसी तरह तेरे दीवाने क़दम क़ादम पे कोई सख़्त मरहला …

ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो

ज़िन्दगी ये तो नहीं, तुझको सँवारा ही न हो कुछ न कुछ हमने तिरा क़र्ज़ उतारा ही न हो कू-ए-क़ातिल की बड़ी धूम है चलकर देखें क्या ख़बर, कूचा-ए-दिलदार …

ज़रा सी बात पे हर रस्म

ज़रा सी बात पे हर रस्म तोड़ आया था दिल-ए-तबाह ने भी क्या मिज़ाज पाया था मुआफ़ कर ना सकी मेरी ज़िन्दगी मुझ को वो एक लम्हा कि मैं …

जब लगे ज़ख़्म तो

जब लगे ज़ख़्म तो क़ातिल को दुआ दी जाये है यही रस्म तो ये रस्म उठा दी जाये तिश्नगी कुछ तो बुझे तिश्नालब-ए-ग़म की इक नदी दर्द के शहरों …

ऐ दर्द-ए-इश्क़ तुझसे मुकरने लगा हूँ मैं

ऐ दर्द-ए-इश्क़ तुझसे मुकरने लगा हूँ मैं मुझको सँभाल हद से गुज़रने लगा हूँ मैं पहले हक़ीक़तों ही से मतलब था, और अब एक-आध बात फ़र्ज़ भी करने लगा …

उजड़ी-उजड़ी हुई हर आस लगे

उजड़ी-उजड़ी हुई हर आस लगे ज़िन्दगी राम का बनबास लगे तू कि बहती हुई नदिया के समान तुझको देखूँ तो मुझे प्यास लगे फिर भी छूना उसे आसान नहीं …

इसी सबब से हैं शायद

इसी सबब से हैं शायद, अज़ाब जितने हैं झटक के फेंक दो पलकों पे ख़्वाब जितने हैं वतन से इश्क़, ग़रीबी से बैर, अम्न से प्यार सभी ने ओढ़ …