Category: जयंत परमार

सुर्रियल ख़्वाब

अभी-अभी थे उसके स्तन नीली ब्रा के रेशमी कैन्वस पर रौशन नाभी की तारीक गली में सब्ज़ घास पर चढ़ती ख़्वाहिश की च्यूँटी जुनूँ के नक़्शे पा पिस्ताँ तक जाते हुए …

नज़्म कहाँ रखी है मैंने

मेज़ के ख़ानों में टेबल पर रैक पे, अलमारी में और बुकशेल्फ़ पे कब से ढूँढ़ रहा हूँ नई-पुरानी किताबों के औराक़े-जुनूँ में खद्दर के कुर्ते की फटी-फटी जेबों …

बेसुतूँ आसमान है मेरा

बेसुतूँ आसमान है मेरा सिर्फ़ वहम-ओ-गुमान है मेरा एक दिन मैं भी जगमगाऊँगा इक सितारे पे ध्यान है मेरा यूँ तो कुछ भी नहीं मेरे बस में और सारा …

हवा का झोंका पुकारता है

हवा का झोंका पुकारता है किसे दरीचा पुकारता है मैं क़ैद कब तक रहूँगा आख़िर शजर का साया पुकारता है पुरानी यादें समेट लेना गुज़रता लम्हा पुकारता है लो …

परिंदा जब भी कोई चीख़ता है

परिन्दा जब भी कोई चीख़ता है ख़ामोशी का समुंदर टूटता है अभी तक आँख की खिड़की खुली है कोई कमरे के अंदर जागता है चमकती धूप का बेरंग टुकड़ा …

पौ फटी धूप का दरिया निकला

पौ फटी धूप का दरिया निकला रास्ता आँख झपकता निकला ज़िस्म की क़ैद से साया निकला उम्र भर जागने वाला निकला नींद की बस्ती में पिछली शब में फिर …

पेंसिल-2

मेरी बच्ची प्यारी-सी नन्हीं बच्ची शार्पनर से सुलगाती है इक पेंसिल सफ़ेद काग़ज़ के आकाश में रौशनी फैलने लगती है– पेड़ को लेकर उड़ती काली चिड़िया मोर की आँखो …

पेंसिल-1

बेंच पे बैठी ब्ल्यू जींस वाली लड़की पेंसिल छीलती है और उसमें से फूटता है इक काला फूल पेंसिल लिखती है काले-काले अक्षर कोरे काग़ज़ पर जैसे काली तितलियाँ! …

ग़ालिब की मज़ार

राग दरबारी में शाम सायाफिगन काले बादल पे तारा शफ़क़ सुर्ख़-रू गुनगुनाती रदीफ़ों के जाम-ओ-सुबू महफ़िले-शब चराग़ाँ फ़क़ीरों की धुन ये ज़मीं-आसमाँ काफ़ियों के नुजूम मेरा बर्गे-दिल सो रहा …

लफ़्ज़ की खूँटी पर लटकता था

लफ़्ज़ की खूँटी पर लटकता था एक मिसरा तुड़ा-मुड़ा-सा था मेरे अंदर था ख़ौफ़ ख़ेमाज़न दफ़ कोई दश्त में बजाता था लहर ग़ायब थी लहर के अदर मैं किनारे …