Category: जनक देसाई

पल भर का करार

तू छुपी है कहां सनम? तू यादगार यहां महरूमी किस्मतका मारा, बेक़ारार यहां फासले कितने!  खामोशी कैसी ! रहम कर बीती बातों की यादों से तेरा इंतज़ार यहां माहोल …

भीतर

भीतर देख रे प्राणी, अंदर देख अंधेर है भीतर , फिरसे देख क्यूँ कोस रहा है देश परदेश तुने ही तो लिखा अपना लेख जहाँ पे तो लाली छाई …