Category: जयप्रकाश मानस

वज़न

धरती का वैभव ऊँचाई आकाश की सूरज की चमक या हो चंदा की चाँदनी पूरी भलमनसाहत सारा-का-सारा पुण्य समूची पृथ्वी पलड़े में चाहे रख दो सावजी डोलेगा नहीं काँटा …

लोग मिलते गए काफ़िला बढ़ता गया

अनदेखे ठिकाने के लिए डेरा उसालकर जाने से पहले समेटना है कुछ गुनगुनाते झूमते गाते आदिवासी पेड़ पेड़ की समुद्री छाँव छाँव में सुस्ताते कुछ अपने जैसे ही लोग …

बचे रहेंगे सबसे अच्छे

अच्छे मनुष्य बचे रहेंगे उनके हिस्से की दुनिया से चले जाने के बाद भी लोककथाओं की असमाप्त दुनिया के राजकुमार की तरह बहुत अच्छे मनुष्य बचे रहेंगे उनके हिस्से …

पुरखे

हम बहुत पहले से हैं बहुत बाद तक हमीं झिलमिलाते रहेंगे पहली बारिश से उमगती गंध की तरह हमारी उपस्थिति है भली-भाँति याद है हमें चंदा को खिलौना बनाकर …

पाँच छोटी कविताएँ

1-सफ़र अनदेखे ठिकाने के लिए डेरा उसालकर जाने से पहले समेटना है कुछ गुनगुनाते झूमते गाते आदिवासी पेड़ पेड़ की समुद्री छाँव छाँव में सुस्ताते कुछ अपने जैसे ही …

तालिबान

कोई दलील नहीं कोई अपील नहीं कोई गवाह नहीं कोई वक़ील नहीं वहाँ सिर्फ़ मौत है कोई इंसान नहीं कोई ईमान नहीं कोई पहचान नहीं कोई विहान नहीं वहाँ …

कोई नहीं है बैठे-ठाले

कोई नहीं है बैठे-ठाले  कीड़े भी सड़े-गले पत्तों को चर रहे हैं कुछ कोसा बुन रहे हैं   केचुएँ आषाढ़ आने से पहले उलट-पलट देना चाहते हैं ज़मीन   …

अन्न-पूजा

अन्न-पूजा जो खेत नहीं जोत सकते जो बीज नहीं बो सकते जो रतजगा नहीं कर सकते जो खलिहान की उदासी नहीं देख सकते उनकी थालियों के इर्द-गिर्द अगर महक …