Category: जगन्नाथदास ‘रत्नाकर’

सुघर सलोने स्याम सुंदर सुजान कान्ह

सुघर सलोने स्याम सुंदर सुजान कान्ह, करुना-निधान के बसीठ बनि आए हौ। प्रेम-प्रनधारी गिरधारी को सनेसो नाहिं, होत हैं अंदेश झूठ बोलत बनाए हौ॥ ज्ञान गुन गौरव-गुमान-भरे फूले फिरौ, …

बैठे भंग छानत अनंग-अरि रंग रमे

बैठे भंग छानत अनंग-अरि रंग रमे, अंग-अंग आनँद-तरंग छबि छावै है। कहै ‘रतनाकर’ कछूक रंग ढंग औरै, एकाएक मत्त ह्वै भुजंग दरसावै है॥ तूँबा तोरि, साफी छोरि, मुख विजया …

बीर अभिमन्यु की लपालप कृपान बक्र

बीर अभिमन्यु की लपालप कृपान बक्र, सक्र-असनी लौं चक्रव्यूह माहिं चमकी। कहै ‘रतनाकर’ न ढालनि पै खालनि पै, झिलिम झपालनि पै क्यों कँ ठमकी॥ आई कंध पै तो बाँटि …

थोरी-थोरी बैस की अहीरन की छोरी संग

थोरी-थोरी बैस की अहीरन की छोरी संग, भोरी-भोरी बातन उचारत गुमान की । कहै रतनाकर बजावत मृदंग-चंग, अंगन उमंग भरी जोबन उठान की ॥ घाघरे की घूमनि समेटि कै …

गोकुल की गैल, गैल गैल ग्वालिन की

गोकुल की गैल, गैल गैल ग्वालिन की, गोरस कैं काज लाज-बस कै बहाइबो। कहै ‘रतनाकर’ रिझाइबो नवेलिनि को, गाइबो गवाइबो और नाचिबो नचाइबो॥ कीबो स्रमहार मनुहार कै विविध बिधि, …

आयौ जुरि उततें समूह हुरिहारन कौ

आयौ जुरि उततें समूह हुरिहारन कौ, खेलन कों होरी वृषभान की किसोरी सों । कहै रतनाकर त्यों इत ब्रजनारी सबै, सुनि-सुनि गारी गुनि ठठकि ठगोरी सों ॥ आँचर की …