Category: जगदीश व्योम

बादल कौन देश से आए!

बादल कौन देश से आए! ये सावन की घटा घनेरी- क्या-क्या राज छिपाए कुछ भूरे, कुछ काले-काले कुछ काले-भूरे कुछ अभाव से ग्रसित और कुछ दिखते हैं पूरे बहते …

बाजीगर बन गई व्यवस्था

बाजीगर बन गई व्यवस्था हम सब हुए जमूरे सपने कैसे होंगे पूरे चार कदम भर चल पाए थे पैर लगे थर्राने क्लांत प्रगति की निरख विवशता छाया लगी चिढ़ाने …

हे चिर अव्यय हे चिर नूतन

कण कण तृण तृण में चिर निवसित हे! रजत किरन के अनुयायी सुकुमार प्रकृति के उदघोषक जीवंत तुम्हारी कवितायी फूलों के मिस शत वार नमन स्वीकारो संसृति के सावन …

हाइकु नवगीत

छिड़ता युद्ध बिखरता त्रासद इंसां रोता है जन- संशय त्रासदी ओढ़कर आगे आया है महानाश का विकट राग फिर देखो गाया है पल में नाश सृजन सदियों का ऐसे …

सो गई है मनुजता की संवेदना

सो गई है मनुजता की संवेदना गीत के रूप में भैरवी गाइए गा न पाओ अगर जागरण के लिए कारवां छोड़कर अपने घर जाइए झूठ की चाशनी में पगी …

सूरज इतना लाल हुआ

जाने क्या हो गया, कि सूरज इतना लाल हुआ। प्यासी हवा हाँफती फिर-फिर पानी खोज रही सूखे कण्ठ-कोकिला, मीठी बानी खोज रही नीम द्वार का, छाया खोजे पीपल गाछ …

मेरा भी तो मन करता है

मेरा भी तो मन करता है मैं भी पढ़ने जाऊँ अच्छे कपड़े पहन पीठ पर बस्ता भी लटकाऊँ क्यों अम्मा औरों के घर झाडू-पोंछा करती है बर्तन मलती, कपड़े …

माँ

माँ कबीर की साखी जैसी तुलसी की चौपाई-सी माँ मीरा की पदावली-सी माँ है ललित रूबाई-सी। माँ वेदों की मूल चेतना माँ गीता की वाणी-सी माँ त्रिपिटिक के सिद्ध …

पीपल की छाँव

पीपल की छांव निर्वासित हुई है और पनघट को मिला वनवास फिर भी मत हो बटोही उदास प्रात की प्रभाती लाती हादसों की पाती उषा किरन आकर सिंदूर पोंछ …

पिउ पिउ न पपिहरा बोल

पिउ पिउ न पिपहरा बोल, व्यथा के बादल घिर आएंगे होगी रिमझिम बरसात पुराने ज़ख्म उभर आएंगे।। आंखों के मिस दे दिया निमंत्रण मुझे किसी ने जब से सुधियों …

न जाने क्या होगा

सिमट गई सूरज के रिश्तेदारों तक ही धूप न जाने क्या होगा घर में लगे उकसने कांटे कौन किसी का क्रंदन बांटे अंधियारा है गली गली गुमनाम हो गई …

चिड़िया और बच्चे

चीं-चीं, चीं-चीं, चूँ-चूँ, चूँ-चूँ भूख लगी मैं क्या खाऊँ बरस रहा बाहर पानी बादल करता मनमानी निकलूँगी तो भीगूँगी नाक बजेगी सूँ-सूँ, सूँ चीं-चीं, चीं-चीं, चूँ-चूँ चूँ ……. माँ …

ग्यारह दोहे

आहत है संवेदना, खंडित है विश्वास। जाने क्यों होने लगा, संत्रासित वातास।। कुछ अच्छा कुछ है बुरा, अपना ये परिवेश। तुम्हें दिखाई दे रहा, बुरा समूचा देश।। सब पर …

गिलहरी

गिलहरी दिन भर आती-जाती फटे-पुराने कपड़े लत्ते धागे और ताश के पत्ते सुतली, कागज, रुई, मोंमियाँ अगड़म-बगड़म लाती। गिलहरी दिनभर आती-जाती।। ठीक रसोईघर के पीछे शीशे की खिड़की के …

आहत युगबोध

आहत युगबोध के जीवंत ये नियम यूं ही बदनाम हुए हम ! मन की अनुगूंज ने वैधव्य वेष धार लिया कांपती अंगुलियों ने स्वर का सिंगार किया अवचेतन मन उदास …