Category: जगदीश नलिन

ना बेटी, ना

रेल की पटरियों से समाधान खोजती अपने वज़ूद की चिन्दियाँ उड़ाने पर आमादा अपने कुल-मर्यादा की चौखट कैसे लाँघ गई बेटी? पुरखों की पगड़ियाँ तुम्हारे रास्ते भर बिछी रहीं …