Category: जगदीश चतुर्वेदी

ताज़े गुलाब का उन्माद

मैंने गुलाब को छुआ और उसकी पंखुड़ियाँ खिल उठीं मैंने गुलाब को अधरों से लगाया और उसकी कोंपलों में ऊष्मा उतर आई। गुलाब की आँखॊं में वसन्त था और …

समाधिस्थ

गुम्बदों पर अन्धेरा ठहर गया है एक काली नदी बहती है अंतस्तल से निबिड़ अन्धकार में। कगारों पर पड़े हैं कटे हुए परिन्दों के अनगिनत पंख और उन पगचिन्हों …