Category: जगन्नाथ त्रिपाठी

अरुणोदय २०१२

यज़ीदों ,रावणों -कंसों के इस घोर शीत कालीन सत्र में महफ़ूज़ रह सकेगी ईमान की थोड़ी हरारत ? तुम्हारे मूक-बधिर मौन में तो दीखती है नकारात्मक सोच ही मौसम की …

कुछ मुक्तक

कुछ मुक्तक मैं कवि हूँ, एक रचयिता हूँ, नीरस को सरस बनाता हूँ बीहड़ बंजारों में निशिदिन, सतरंगी प्रसून खिलाताहूँ जब जगता मुझमें स्वाभिमान औ सोऽहं का उन्माद उस …

मै कवि क्यों बना

मै कवि क्यों बना ? परम पुनीत प्राच्य पथ-परिपंथियों के परिमर्दनार्थ कभी पवि बनना पड़ा राम की रुचिर रूप रेखा-रश्मि राशि द्वारा रोते राहियों के लिए रवि बनना पड़ा। छाई …

टूटी पायल से बिखरे मेरे छन्द-बन्ध

करुणे ! तम घिरी अमावश्या में तुम दीप महोत्सव बनकर आयीं मेरे जीवन-गृह में आलोक-भविष्यत् बनकर।। करुणाकर! मैं कृतकृत्य हुआ तेरी करुणा को पाकर कामना यही है करुणा का विस्तार …

ऐसा राम कहाँ मिलता है?

ऐसा राम कहाँ मिलता है? फागुन में प्रेमी-मन को आराम कहाँ मिलता है? आराम मिले भी तो कोई निष्काम कहाँ मिलता है? तोड़ दे भारी धनुष जो आज भ्रष्टाचार …

ऐसा भाई भला कहाँ मिलता है?

ऐसा भाई भला कहाँ मिलता है? पुत्राभिषेक का मोह न हो वह माँ का हदय कहाँ मिलता है? सुत-दुख से आहत प्राण त्याग दे ऐसा पिता कहाँ मिलता है? …

बापू

बापू ! ओ चिर-संयम की तपो मूर्ति ! तपो-व्योम के विभ्राट् परिव्राजक सम्राट् ! दर्शन-गिरि-श्रृंग ! विश्व-वन्द्य बापू ! अब आओ, आओ, भारत को तुम्हारी आज बेहद ज़रूरत है। यह आर्यावर्त्त, महान साधना औ …

चर्चा-परिचर्चा में

चर्चा-परिचर्चा में हर क्षण ओरिजनल्टी-नावेल्टी की दुहाई दिया करते है। अपने थोथे पन को नवीन अर्थवृत्तों में वलयित किया करते हैं। और, इन सब पर बौद्धिकता तथा यथार्थ का …