Category: जगजीवन

पावक सर्व अंग काठहिं माँ

पावक सर्व अंग काठहिं माँ, मिलिकै करखि जगावा। ह्वैगै खाक तेज ताही तैं, फिर धौं कहाँ समावा॥ भान समान कूप जब छाया, दृष्टि सबहि माँ लावा। परि घन कर्म …