Category: जाबिर हुसेन

दीवार-ए-शब

कारवाँ लुट गया क़ाफ़िले मुंतशिर हो गए तीरगी का धमाका हुआ और दीवार-ए-शब ढह गई सिर्फ़ सरगोशियाँ मेरी आँखों में अलफ़ाज़ की किरचियाँ भर गईं और एहसास की शाह …

कभी इस जा

गली-कूचे में खेतों में, पहाड़ों में गुफ़ा में, जंगलों में नदी में, आबशारों में फ़िज़ाओं में, ख़ला में इकहरी धूप में ठंडी हवा में घने कुहरे में रौशन आग …

आग से ख़ौफ़ नहीं

आग से ख़ौफ़ नहीं आग जलती है तो उसकी लौ से एक पैकर-सा उभरता है मेरे ख़्वाबों में एक पैकर जो बसद इज्ज़-व-अना मांगता है मेरी ख़ातिर मेरे रब …