Category: ईश्‍वर दत्‍त माथुर

समन्‍दर का किनारा

उफनती लहर ने पूछा समन्‍दर के किनारे से निस्‍तेज से क्‍यूँ हो शान्‍त मन में क्‍या है तुम्‍हारे । समेटे हूँ अथाह सागर तीखा, पर गरजता है । छल, …

रेत के समन्‍दर में सैलाब

रेत के समन्‍दर में सैलाब आया है न जाने आज ये कैसा ख़्वाब आया है दूर तक साँय-साँय-सी बजती थी शहनाई जहाँ वहीं लहरों ने मल्‍हार आज गाया है …

मृगतृष्‍णा

एक मोटा चूहा मेरी ज़िन्‍द़गी को बार-बार कुतर रहा है अपने पैने दाँतों से । उसने मेरी ज़िन्‍दगी की डायरी को कुतर-कुतर के अपनी भटकती ज़िन्‍दगी का बदला लेना …

मर्यादा का मुखौटा

ये क्‍या है, जो मानता नहीं समझता नहीं समझना चाहता नहीं कुछ कहता नहीं कुछ कहना चाहता नहीं। तुम इसे गफ़लत का नाम दो मैं इसे मतलब का । …

क्‍या लिखूँ ?

भाव बहुत हैं, बेभाव है, पर उनका क्‍या करूँ तुम मुझे कहते हो लिखो, पर मैं लिखूँ किस पर समाज के खोखलेपन पर लोगों के अमानुषिक व्‍यवहार पर या …

उजियारे की डोर (कविता)

उजाले के समन्‍दर में गोते लगाकर मैंने अंधियारे मन को रोते देखा । जगमगाहट से लबरेज़ उस हवेली का हर कोना फटे-हाल भिखारी-सा, सजा-धजा-सा था । पर, मौन, नि:शब्‍द, …