Category: हिमांशु श्रीवास्तव

“हनुमत शरण”

हो निरुपाय वीरवर बैठे, सिन्धु हिलोरें लेता था। “जाने दूंगा नहीं आज मैं” हो मदांध यह कहता था। जाम्बवंत, नल, नील, केसरी, अंगदादि हनुमान खड़े। लंका उधर, वहां माँ …

“ज़िन्दगी”

ग़म हैं या ख़ुशी है, ये तो ज़िन्दगी है । छोटी-छोटी खुशियाँ हैं, प्यारे-प्यारे वादे हैं, दिल में कुछ उमंगें हैं, मन में कुछ इरादे हैं । यहाँ पर, …

“रश्मि”

तुम मेरी जीवनधारा हो तुम ही साँसों की माला। तुम ही हो इस हिय का स्पंदन तुम ही आँखों की ज्वाला। यदि ‘हिमांशु’ में ‘रश्मि’ नहीं हर रात अँधेरी …

“अंतर्द्वंद”

जाने किस दुविधा में हूँ मैं, क्या यह अंतर्द्वंद समाया। उच्छवासें आती हैं प्रतिपल, मन में गहन विषाद समाया।   आकांक्षाओं की सरिता यह, आशा और निराशा दो तट। सीमाओं …

“खच्चर”

खादीधारी खच्चर देखो, आओ तुम को दिखलाते हैं। ये बकरा राजनीति का है, इससे तुमको मिलवाते हैं।   कुर्ता-धोती सब खादी की, ‘गाँधी’ की टोपी डाली है। हाथों में …

“पैमाना”

मैंने पूछा ‘पैमाने’ से, ये कैसा जीवन तेरा है? खालीपन तुझमें छाया है, या फिर मदिरा का घेरा है।   पत्थर से तुझको पीस-पीस, फिर खूब जलाया जाता है। …

“श्रम-आराधना”

एक कहानी सुन लो तुम, मैं आज तुम्हें समझाता हूँ। “है कर्म सफलता की कुंजी” मैं ये रहस्य बतलाता हूँ।   एक गुरु हुए हैं तेजस्वी, जो बोपदेव कहलाते …