Category: हेमन्त शेष

किताबें

खोल देती हैं वे हम में सदियों से बंद आँखें उन से टपकने लगते हैं पछतावे अपने बहुत छोटे और मामूली होने के पन्नों पर उगे रहते हैं पठार …

प्रलय से पहले चीज़ें

मामूली चीज़ों की शक्ल धर कर प्रतिदिन असंख्य बार नियामतें दुर्निवार प्रलय के रोकती हैं जैसे ध्यान से देखने पर दरवाज़े दस्तक की प्रतीक्षा में डूबे जाने पड़ते हैं …

मधुमक्खियाँ

किस आत्मलीनता में डूबी रहती हैं मधुमक्खियाँ वे कब सोती और कब जागती हैं निरन्तर उड़ती और गुनगुनाती ही क्यों दिखलाई देती हैं मधुमक्खियाँ क्या वे जानती हैं कब …

पुरानी चिट्ठियाँ

कोई एक पुरानी चिट्ठी खोल देती है मुझ में अँधेरा बन्द तहख़ाना एक संदूक जैसे खुला करता था काठ का विशालकाय कभी बचपन में निकलते थे जिसमें सर्दियाँ आने …

पहाड़ से लौट कर

हम जहाँ कहीं जाएँ पहाड़ हमें बुलाएँगे उनकी कोख से फूटेंगे झरने जिन के जल में हमारे लौटने की प्रतीक्षाएँ दर्ज होंगी आकाश के अनंत की तरफ तनी होंगी …

घर लौटना

कोहरे और ओस से भरे दिनों को याद करता हूँ जैसे मैं फिर लौटता हूँ घर अकेला और निरुपाय पीछे छोड़ कर अपना असबाब बन्द हैं दरवाज़े और चिडि़यों …

नदी-यात्रा

बन्द सन्दूकों से लदी नावें काली औरतों की भीड़ बहते हुए पानी की आवाजें शोरगुल से भरी यात्राओं का कोई अन्त नहीं सख्त हाथों वाले उम्र को कोसते मल्लाह …

बहुत कुछ जैसा कुछ नहीं

तुम्हारी बेफिक्र आशंका की चिलचिलाती हुई छाया से गुज़र कर ठहरा हुआ जाता हूँ एक खेद भरी प्रसन्नता की तरफ़ हँसती हुई उदास चीजें हैं आसपास और स्थिर लगती …

कैसा होगा पत्थरों का वसन्त

प्रतिदिन छोड़ता हूँ पीछे अपने पाँव चिन्हों की शक्ल में जो पत्थरों पर छपते अदृश्य कुछ क्षण वहीं ठहर कर सोचता हूँ जो स्थिर है क्या वह चल नहीं …

खिड़की में कबूतर

बैठा कबूतर एक खिड़की में मेरी लगता जैसे चबा डालता मेरे शब्द जब-जब उगता दिन एक ध्वनिविहीन, रंगहीन, गन्धहीन बेस्वाद, उसे लिखता मैं कविता में कमरे में भर रही …

कुर्सी

हममें से शायद हर एक कुर्सी जैसी साधारण किन्तु अत्यधिक उपयोगी चीज़ की  बनावट से परिचित है अधिकतर यह लकड़ी की बनायी जाती है और इसी वजह से हरे-भरे …