Category: हेमन्त शेष

“एक सफ़र” – दुर्गेश मिश्रा

– एक सफ़र देखे मैंने इस सफर में दुनिया के अद्भुत नज़ारे, दूर बैठी शोर गुल से यमुना को माटी में मिलते | की देखा मैंने इस सफर में….. …

आगमन

बहुत बरसों बाद अचानक जब हम आएँगे अपने घर किस तरह होगा हमारा स्वागत ? क्या हमारे आगमन पर लोगों के मुँह से चीख निकल जाएगी खुशी की या …

तबादला

बहुत दिनों बाद आश्चर्य में घिरते फिर से लौटना उसी शहर में बस की चैकोर खिड़की में नहीं समाती नई नई इमारतें कल तक खाली पड़े मैदान में विशाल …

आँसू

साहित्यिक मूल्यों की दृष्टि से आँसुओं में छिपा रहता है अक्सर किसी अधलिखी कविता या कहानी का अंश जीवविज्ञान के अनुसार वे हमारी प्रजाति का विशेषाधिकार हैं ख़ास तौर …

रात

यह कोई दूसरा नक्षत्र ही है बहुत सारे प्रयोजनों के लिए प्रकाश में हम जिस दुनिया से परिचित थे वह तो पश्चिम के सूर्यास्त पर ही बुझ गयी तुम्हारे …

लालटेन

लालटेन-1 वह, जो डबडबा गया है भीतर बुझती रोशनी का आलोक, चाहेंगे हम तत्क्षण उसे किसी बचाये हुए काव्यार्थ से जोड़ना तारीख़ों का मतलब क्या है घडि़यों की सभ्यता …

माँ

दुर्गम पहाड़ों के परे अबाध झरनों के पार बीहड़ जंगलों के आखिरी किनारे पर अकेली रहती है जो स्त्री वही शायद हम सब की माँ है बहुत दफ़ा हम …

चीटियाँ

चीटियाँ मृत्यु तक सर्वशक्तिमान हैं भूमि पर स्थित हर चीज़ तक उनकी पहुँच है वे जानती हैं मनुष्य की क्षुद्र और नश्वर दुनिया के बहुत से तथ्य अपनी सूक्ष्म …

नींद

समय जैसा वह कुछ भी नहीं था जिसे बीतना पड़ता जिन शरीरों के भीतर से दोपहर को गुज़रना पड़ा कदाचित् वे भी हमारे न थे दूर सम्भवतः सिर्फ़ छायाएँ …

सवेरे की चाय

आज तीन मई उन्नीस सौ अठ्यासी है मंगलवार गर्मी के दिन हैं पंचांग के अनुसार ज्येष्ठ कृष्ण द्वितीया और घड़ी में छः बजा चाहते हैं अब हमारी प्रातःकालीन सभा …

आँधी

आँधी एक शब्द ही नहीं हादसा है किसी प्रकोप किसी अतीत किसी महीने की पौध हमारे भीतर उगाती हुई यह घडि़यों से गायब कर देती है वक्त थरथराती हुई …

अज्ञातवास से लौट कर

अपने हर अज्ञातवास पर हम थे पहाड़ जैसे निष्कंप किंतु भीतर से ओस जैसे आर्द्र खेद और प्रतीक्षा में निकल रहे थे वर्ष वस्तुएँ बरस रही थीं बेरहमी से …

जैसलमेर

रेत एक दृश्य था असमाप्त उचाट निस्संग आकाश और बाँझ पृथ्वी के बीच टँगा हुआ किवाड़ भेडें और गोबर लिपे आँगन सवेरे से टीलों के बीच उबल रहे थे …

जो कविता नहीं कहती

कविता कहती है सिर्फ तीन दिन बाद लोग बदल जाएँगे पत्नियों को बेइन्तहा प्यार करने वाले और बच्चों की इच्छाओं के लिए समर्पित शाम को अच्छे कपड़े पहन कर …

स्त्री

स्त्री (ब्राज़ील के कवि म्यूरिलो मैंडस की रचना ‘अधचिडि़या’ पढ़ कर) अंतरिक्ष के आखिरी छोर पर खड़ी एक स्त्री पक्षियों को पंख पेट को अन्न आँखों को दृश्य कवियों …