Category: हेमन्त कुमार

खतरा अस्तित्व का

एक बादल का टुकड़ा खरगोश के छौने जैसा फ़ुदक रहा है इन काले पहाड़ों के ऊपर बरसने को आतुर्। पर सहम जाता है बार बार पहाड़ों की कठोरता और …

भयाक्रान्त

उसकी आंखों की पुतलियों में अब नहीं होती कोई हलचल सतरंगे गुब्बारों और लाल पन्नी वाले चश्मों को देखकर। नहीं फ़ड़कते हैं अब उसके होंठ बांसुरी बजाने के लिये …

ओ मां

जब भी मैं बैठता हूं ढलते सूरज के साथ बालकनी में कुर्सी पर अकेला मेरी आंखों के सामने आता है कैमरे का व्यूफ़ाइंडर और उसमें झलकती है एक तस्वीर …