Category: हरप्रसाद पुष्पक

“एक सफ़र” – दुर्गेश मिश्रा

– एक सफ़र देखे मैंने इस सफर में दुनिया के अद्भुत नज़ारे, दूर बैठी शोर गुल से यमुना को माटी में मिलते | की देखा मैंने इस सफर में….. …

जिन्दगी

रोशनी सूरज की ढलान पर है परिन्दा लौटती उडान पर है चेहरा हो गया मायूस उसका निगाह आ गये मेहमान पर है फिकरमन्द झोपडी टूटी है जिसकी दरिया फिर दीखती उफान पर है बच्चा भूखा ही सो गया होगा बेबसी मां की फिर जुबान पर है दरिन्दगी किस तरह से हावी है जिन्दगी रोज इम्तहान पर है तासीर सच की कम हो गयी होगी झूठ की शान हर जुबान पर है जद्दोजहद उम्र भर की रोटी के लिये आज भी आखिरी मुकाम पर है सियासत आसमान की पुष्पक जमीन खतरे के निशान पर है  

राजनीति

अब नेता जी वोट मांगने के लिये जनता के पास नही जायेंगे फिर भी इलैक्शन जीत जायेंगे यह सौ प्रतिशत सच का दावा है अभी-अभी एक तांत्रिक ने सौ मुर्गें और पच्चीस बकरे मांगा है साथ मे मादिरा भी जायेंगी जैसे जैसे मुर्गे और बकरों की बलि देगा नेता जी के पक्ष मे वोटो पर असर पडेंगा जब पूर्ण आहुति का होगा भोग सबल हो जायेगा जीत का योग तांत्रिक के जाप और बलि क प्रभाव पहले भी कई नेता/अभिनेता देख चुके है जनाब तांत्रिक का भयंकर प्रभाव और कर्मकांड है अब तो विदेशो तक मे भरी मांग है तभी किसी ने व्यंग से बीच मे टोका जीत के लिये मूक पशुओं का बलिदान याद रखेगा २१वीं सदी का हिन्दुस्तान विज्ञान के सीने पर फिर तांत्रिक ने गोला दागा था यह तांत्रिक तो वही है जो कत्ल और डकैती के इल्जाम में पच्चीस साल पहले जेल से भागा था आज नेता जी उसके चरण छू रहे है ढोंगी, आधुनिक युग में जनता तो जनता …

अनुभूति

अनुभूति आनंद की खंगालता अर्थ मे व्यर्थ मे जो देती आनंद खुजाने सा दाद/खुजली फिर पीडा असहनीय झेलता पीडा फिर भी खेलता खेल अर्थ का सम्मोहन मॄग मरीचिका का करती विकल फिर भी सुख की खोज अर्थ मे? व्यर्थ मे जीवन सफल या विफल

जमाना

जमाने मे कोई सानी नहीं हैं जिगर मे जिसके बेमानी नही हैं दिवानापन शहीदो सा है जिसका उसकी कोई कदरदानी नही हैं झूठ पर झूठ बोले जा रहे हैं सियासत हैं ये नादानी नहीं हैं दिलों को बाटते मतलब को अपने वतन की आबरु पहचानी नही हैं किस कदर बिगडे हैं हालाते वतन रोटी बिजली हवा पानी नही हैं जिसको देखो हवा मे उड रहा है जिन्दा है बस जिन्दगानी नही है कुछ के हिस्से मे कायनात सारी लुटने की नीयत दानी नही है सुर तुलसी कबीरा सा लिखे जो पुष्पक ऐसी कोई बानी नही है तबाही क मन्जर हो जिसकी आदत सिरफिरा है वो हिन्दुस्तानी नही है जिस्म जल्लाद आंखों मे बगावत मुल्क परस्ती कि निशनी नही हैं

जीवन जीना

जीवन जीना हो गय है जीने सा (सीढियां) चढना एक एक पौङी हताश/निराश हांफते/कांपते फुलती सांसे सूखते औंठ माथे पर पसीना कितना दूभर हो गया है जीना परन्तु ! जो नही आम आदमी नही चढते सीढियां फिर भी पहूंच जाते ऊपर जितना चाहें आटों लिफ्ट से पल भर में कितना आसान है चढना डर भी नही फिसलने का परन्तु ! फिर भी फिसल जाते है कभी कभी जहां नही फिसलता आम आदमी भी उनकी तरह जो फिसलते है जिव्हा से/ मंच से व्याकुल त्रस्त जनता के आक्रोश के पंच से अंतरंग  वैडरुम से आलीशान बथरुम से जिसके उबरने मे …