Category: हरिवंशराय बच्चन

“एक सफ़र” – दुर्गेश मिश्रा

– एक सफ़र देखे मैंने इस सफर में दुनिया के अद्भुत नज़ारे, दूर बैठी शोर गुल से यमुना को माटी में मिलते | की देखा मैंने इस सफर में….. …

इस पार प्रिए मधु है तुम हो-मधु कलश

इस पार, प्रिये मधु है तुम हो, उस पार न जाने क्या होगा! यह चाँद उदित होकर नभ में कुछ ताप मिटाता जीवन का, लहरालहरा यह शाखाएँ कुछ शोक …

चल मरदाने

चल मरदाने, सीना ताने, हाथ हिलाते, पांव बढाते, मन मुस्काते, गाते गीत । एक हमारा देश, हमारा वेश, हमारी कौम, हमारी मंज़िल, हम किससे भयभीत । चल मरदाने, सीना …

राष्ट्रीय ध्वज

नागाधिराज श्रृंग पर खडी हु‌ई, समुद्र की तरंग पर अडी हु‌ई, स्वदेश में जगह-जगह गडी हु‌ई, अटल ध्वजा हरी,सफेद केसरी! न साम-दाम के समक्ष यह रुकी, न द्वन्द-भेद के …

चिडिया और चुरूंगुन

छोड़ घोंसला बाहर आया, देखी डालें, देखे पात, और सुनी जो पत्‍ते हिलमिल, करते हैं आपस में बात;- माँ, क्‍या मुझको उड़ना आया? ‘नहीं, चुरूगुन, तू भरमाया’ डाली से …

आ रही रवि की सवारी

नव-किरण का रथ सजा है, कलि-कुसुम से पथ सजा है, बादलों-से अनुचरों ने स्‍वर्ण की पोशाक धारी। आ रही रवि की सवारी। विहग, बंदी और चारण, गा रही है …

लहर सागर का श्रृंगार नहीं

लहर सागर का नहीं श्रृंगार, उसकी विकलता है; अनिल अम्बर का नहीं खिलवार उसकी विकलता है; विविध रूपों में हुआ साकार, रंगो में सुरंजित, मृत्तिका का यह नहीं संसार, …

साथी, साँझ लगी अब होने!

फैलाया था जिन्हें गगन में, विस्तृत वसुधा के कण-कण में, उन किरणों के अस्ताचल पर पहुँच लगा है सूर्य सँजोने! साथी, साँझ लगी अब होने! खेल रही थी धूलि …

रात आधी खींचकर मेरी हथेली एक उँगली से लिखा था ’प्यार’ तुमने

फ़ासला था कुछ हमारे बिस्तरों में और चारों ओर दुनिया सो रही थी, तारिकाएँ ही गगन की जानती हैं जो दशा दिल की तुम्हारे हो रही थी, मैं तुम्हारे …

मेघदूत के प्रति

महाकवि कालिदास के मेघदूत से साहित्यानुरागी संसार भलिभांति परिचित है, उसे पढ़ कर जो भावनाएँ ह्रदय में जाग्रत होती हैं, उन्हें ही मैंने निम्नलिखित कविता में पद्यबध्द किया है …

तुम तूफान समझ पाओगे

गीले बादल, पीले रजकण, सूखे पत्ते, रूखे तृण घन लेकर चलता करता ‘हरहर’–इसका गान समझ पाओगे? तुम तूफान समझ पाओगे ? गंध-भरा यह मंद पवन था, लहराता इससे मधुवन था, …

स्वप्न था मेरा भयंकर

रात का-सा था अंधेरा, बादलों का था न डेरा, किन्तु फिर भी चन्द्र-तारों से हुआ था हीन अम्बर! स्वप्न था मेरा भयंकर! क्षीण सरिता बह रही थी, कूल से …

बंगाल का काल

पड़ गया बंगाले में काल, भरी कंगालों से धरती, भरी कंकालों से धरती! दीनता ले असंख्य अवतार, पेट खला, हाथ पसार, पाँच उँगलियाँ बाँध, मुँह दिखला, भीतर घुसी हुई …

इतने मत उन्‍मत्‍त बनो

इतने मत उन्‍मत्‍त बनो! जीवन मधुशाला से मधु पी बनकर तन-मन-मतवाला, गीत सुनाने लगा झुमकर चुम-चुमकर मैं प्‍याला- शीश हिलाकर दुनिया बोली, पृथ्‍वी पर हो चुका बहुत यह, इतने …

त्राहि त्राहि कर उठता जीवन

जब रजनी के सूने क्षण में, तन-मन के एकाकीपन में कवि अपनी विव्हल वाणी से अपना व्याकुल मन बहलाता, त्राहि, त्राहि कर उठता जीवन! जब उर की पीडा से …

नीड़ का निर्माण फिर-फिर

नीड़ का निर्माण फिर-फिर, नेह का आह्णान फिर-फिर! वह उठी आँधी कि नभ में छा गया सहसा अँधेरा, धूलि धूसर बादलों ने भूमि को इस भाँति घेरा, रात-सा दिन …

मैं कल रात नहीं रोया था

दुख सब जीवन के विस्मृत कर, तेरे वक्षस्थल पर सिर धर, तेरी गोदी में चिड़िया के बच्चे-सा छिपकर सोया था! मैं कल रात नहीं रोया था! प्यार-भरे उपवन में …

ऐसे मैं मन बहलाता हूँ

सोचा करता बैठ अकेले, गत जीवन के सुख-दुख झेले, दंशनकारी सुधियों से मैं उर के छाले सहलाता हूँ! ऐसे मैं मन बहलाता हूँ! नहीं खोजने जाता मरहम, होकर अपने …

क्षण भर को क्यों प्यार किया था?

अर्द्ध रात्रि में सहसा उठकर, पलक संपुटों में मदिरा भर तुमने क्यों मेरे चरणों में अपना तन-मन वार दिया था? क्षण भर को क्यों प्यार किया था? ‘यह अधिकार …

लो दिन बीता लो रात गयी

सूरज ढल कर पच्छिम पंहुचा, डूबा, संध्या आई, छाई, सौ संध्या सी वह संध्या थी, क्यों उठते-उठते सोचा था दिन में होगी कुछ बात नई लो दिन बीता, लो …

क्या है मेरी बारी में

जिसे सींचना था मधुजल से सींचा खारे पानी से, नहीं उपजता कुछ भी ऐसी विधि से जीवन-क्यारी में। क्या है मेरी बारी में। आंसू-जल से सींच-सींचकर बेलि विवश हो …