Category: हरिहर झा

प्रकृति मौसी

माँ सी मौसी आगबबूला जाने कब से, अंगारों में लड़खड़ा गई आवारा बच्चे  ना माने पकड़ें गरदन करें शरारत  उसको काटें लहू भरे गालों  पर चाटें बही वेदना की …