Category: गोविन्द माथुर

गृहस्थन होती एक लड़की

गेहूँ चावल दाल बीनते छानते उसकी उम्र के कितने दिन चुरा लिए समय ने उसे अहसास भी नही हुआ घर की चार दीवारी में दिन रात चक्कर काटती वह …

काम से लौटती स्त्रियाँ

जिस तरह हवाओं में लौटती है ख़ुशबू पेड़ों पर लौटती हैं चिड़ि़याँ शाम कों घरों को लौटती हैं काम पर गई स्त्रियाँ सारा दिन बदन पर निगाहों की चुभन …

कविता से कोई नहीं डरता

किसी काम के नहीं होते कवि बिजली का उड़ जाये फ्यूज तो फ्यूज बाँधना नहीं आता नल टपकता हो तो टपकता रहे रात भर चाहे कितने ही कला-प्रेमी हों …

कविता के लिए

मैं शब्द ढूंढता हूँ कविता लिखने के लिए शब्द हैं कि पकड़ में नही आते दौड़ते फिरते हैं पूरे घर में कमरे से चांदनी में चांदनी से इकदरी में …

एक घर : गर्मी की दुपहरी में

तुम अपने कैनवास पर बनाओ एक चित्र गर्मी की दुपहरी का रंग अपनी पसन्द के भरो पर गर्मी में ताप होना चाहिए और दुपहरी में अलसायापन धारीदार जांघिया पहने …

उस लड़की की हँसी

उस खिलाखिलाती लड़की की तस्वीर कैद कर लो अपनी आँखों के कैमरे में उस लड़की की अल्हड़ता उस लड़की की हँसी उस लड़की का शर्माना कैद कर लो अपनी …

ईश्वर तो है कहीं अयोध्या में

मैं मूर्ख अज्ञानी पता नहीं अब तक क्या-क्या पढ़ता रहा न जाने किस अंधकार में भटकता रहा खोजता रहा ईश्वर को अपने अन्दर ईश्वर न तो मेरे अन्दर है …

अक्सर हम भूल जाते है

अक्सर हम भूल जाते हैं चाबियाँ जो किसी खजाने की नहीं होती अक्सर रह जाता है हमारा कलम किसी अनजान के पास जिससे वह नहीं लिखेगा कविता अक्सर हम …