Category: गोविन्द गुलशन

मेरे क़रीब जितने अँधेरे थे हट गये

मेरे क़रीब जितने अँधेरे थे हट गए उनसे मिला तो मुझसे उजाले लिपट गए दरिया जो दरमियान था, गहरा न था मगर पानी में जब पड़े तो मेरे पैर …

मिलने-जुलने की शुरुआत कहाँ से होती

मिलने-जुलने की शुरुआत कहाँ से होती फ़ासले थे तो मुलाक़ात कहाँ से होती एक बस आग-सी सीने में लिए फिरते रहे ऎसे बादल थे तो बरसात कहाँ से होती …

मंज़र क्या पसमंज़र मेरे सामने है

मंज़र क्या पसमंज़र मेरे सामने है फूल नहीं है पत्थर मेरे सामने है मैं तो अपनी प्यास बुझाने आया था प्यासा एक समंदर मेरे सामने है जान से जाऊँ …

बहुत ख़फ़ा हैं वो आज हमसे हमें बस इतना जता रहे हैं

बहुत ख़फ़ा हैं वो आज हमसे हमें बस इतना जता रहे हैं हमी से नज़रें मिलाना सीखे हमी से नज़रें चुरा रहे हैं गिरा-गिरा कर दिलों पे बिजली कमाल …

पानी का एक कारवाँ घर-घर में आ गया

पानी का एक कारवाँ घर-घर में आ गया सैलाब जाने कैसा समन्दर में आ गया इक दर्द की कराह से उबरे नहीं थे हम इक और दर्द अपने मुक़द्दर …

दिल है उसी के पास,हैं साँसें उसी के पास

दिल है उसी के पास,हैं साँसें उसी के पास देखा उसे तो रह गईं आँखें उसी के पास बुझने से जिस चराग़ ने इन्कार कर दिया चक्कर लगा रही …

दिल में ये एक डर है बराबर बना हुआ

दिल में ये एक डर है बराबर बना हुआ मिट्टी में मिल न जाए कहीं घर बना हुआ इक ’लफ़्ज़’ बेवफ़ा कहा उसने फिर उसके बाद मैं उसको देखता …

दिल को सुकून दीदा-ए-तर ने नहीं दिया

दिल को सुकून दीदा-ए-तर ने नहीं दिया ज़ख़्मों को नम हवाओं ने भरने नहीं दिया दामन पे आँसुओं को बिखरने नहीं दिया दरिया को साहिलों से उभरने नहीं दिया …

होता रहा जब राख मेरा घर मेरे आगे

होता रहा जब राख मेरा घर मेरे आगे रोता ही रहा मेरा मुक़द्दर मेरे आगे ख़ुशबू तो कई रंग की लाया है सवेरा बिखरा है मगर शाम का मंज़र …

हमारे जैसा बुरा उसका हाल था ही नहीं

हमारे जैसा बुरा उसका हाल था ही नहीं मलाल कैसा, उसे तो मलाल था ही नहीं गिरफ़्त तुम हुए जिसमें वो जाल था ही नहीं वो हुस्न का था …

हमारे चाहने वाले बहुत हैं

हमारे चाहने वाले बहुत हैं मगर दिल देखिए छाले बहुत हैं नज़र ठोकर पे ठोकर खा रही है उजाले हैं मगर काले बहुत हैं भरोसा इसलिए तुम पर नहीं …

हमने जाना मगर क़रार के बाद

हमने जाना मगर क़रार के बाद ग़म ही मिलते हैं एतबार के बाद क्यूँ न सारे चराग़ गुल कर दें कौन आता है इन्तिज़ार के बाद ख़ुशबुओं की तलाश …

हमने कितने ख़्वाब सजाए याद नहीं

हमने कितने ख़्वाब सजाए याद नहीं कितने आँसू ,आँख में आए याद नहीं डूबे, उभरे ,फिर डूबे इक दरिया में कितने ग़ोते हमने खाए याद नहीं हमने बाँध रखी …

हमको देखो ज़रा क़रीने से

हमको देखो ज़रा क़रीने से हम नज़र आएँगे नगीने से तुम मिलो तो निजात मिल जाए रोज़ मरने से,और जीने से रोज़ आँखें तरेर लेता है एक तूफ़ाँ मेरे …

वो तो क्या-क्या सितम नहीं करते

वो तो क्या-क्या सितम नहीं करते हम ही आँखों को नम नहीं करते आँधियों से हो दुश्मनी तो फिर लौ चराग़ों की कम नहीं करते आप की बात देख …

वहाँ चराग़ यहाँ रौशनी का साया है

वहाँ चराग़ यहाँ रौशनी का साया है सफ़र के बाद उजाला क़रीब आया है उड़ा हुआ है बहुत रंग उसके चेहरे का ये जब है, राज़ से पर्दा नहीं …

लफ़्ज़ अगर कुछ ज़हरीले हो जाते हैं

लफ़्ज़ अगर कुछ ज़हरीले हो जाते हैं होंठ न जाने क्यूँ नीले हो जाते हैं उनके बयाँ जब बर्छीले हो जाते हैं बस्ती में ख़ंजर गीले हो जाते हैं …

रौशनी की महक जिन चराग़ों में है

रौशनी की महक जिन चराग़ों में है उन चराग़ों की लौ मेरी आँखों में है है दिलों में मुहब्बत जवाँ आज भी पहले जैसी ही ख़ुशबू गुलाबों में है …

रेगिस्तानी आँखों में भी हैं तस्वीरें पानी की

रेगिस्तानी आँखों में भी हैं तस्वीरें पानी की क्या-क्या पेश करूँ बतलाओ और नज़ीरें पानी की मिटने से भी मिट न सकेंगी चंद लकीरें पानी की पत्थर पर मौजूद …

राहे-उल्फ़त में मुकामात पुराने आए

राहे उल्फ़त में मुक़ामात पुराने आए तुम न आए तो मुझे याद फ़साने आए वक़्ते-रुख़्सत न दिया साथ ज़ुबाँ ने लेकिन अश्क बन कर मेरी आँखों में तराने आए …

तुमने कितनी क़समें खाईं याद करो

तुमने कितनी क़समें खाईं याद करो हम थे तुम्हारी ही परछाईं याद करो फूल बहुत ख़ुशबू देते थे चाहत के कलियाँ फिर कैसे कुम्हलाईं याद करो पहले था ख़ामोश …

जो ख़त लिखे हुए थे, किताबों में रह गए

जो ख़त लिखे हुए थे किताबों में रह गए आँखों में जितने ख़्वाब थे आँखों में रह गए ऐसी हवा चली कि बुझाती गई चराग़ यानी उजाले क़ैद चराग़ों …

जहाँ भी आबो-दाना हो गया है

जहाँ भी आबो-दाना हो गया है वहीं अपना ठिकाना हो गया है हमारे ख़्वाब का ताबीर से अब तअ’र्रूफ़ ग़ायबाना हो गया है हम अपने दिल का सौदा कर …

गुज़ारे के लिए एक आशियाना कम नहीं होता

गुज़ारे के लिए एक आशियाना कम नहीं होता महल वालों से छप्पर का ठिकाना कम नहीं होता मेरे घर जो भी आता है वो बरकत साथ लाता है परिन्दे …

ख़ुशबुओं की तरह जो बिखर जाएगा

ख़ुशबुओं की तरह जो बिखर जाएगा अक़्स उसका दिलों में उतर जाएगा दर्द से रोज़ करते रहो गुफ़्तगू ज़ख़्म गहरा भी हो तो वो भर जाएगा वो न ख़ंजर …