Category: गोपालशरण सिंह

वसन्त वर्णन

द्रुतविलम्बित दुखद दूर हुआ हिम-त्रास है, सुखद आगत श्री मधुमास है । अब कहीं, दुख का न निवास है, सब कहीं बस हास-विलास है ।।1।। दिवस रम्य, निशा रमणीय …

दीन भारत के किसान

कर रहे हैं ये युगों से ग्राम में अज्ञात-वास, अंग जीवन का बनी है जन्म से ही भूख-प्यास, किन्तु हरते क्लेश हैं निज देश को कर अन्न-दान दीन भारत …

शांति रहे पर क्रांति रहे

फूल हँसें खेलें नित फूलें, पवन दोल पर सुख से झूलें किन्तु शूल को कभी न भूलें, स्थिरता आती है जीवन में यदि कुछ नहीं अशान्ति रहे शांति रहे …