Category: गोपाल कृष्‍ण भट्ट ‘आकुल’

पावस दोह

आवत देख पयोद नभ,पुलकि‍त कोयल मोर। नर नारी खेतन चले, लि‍एसंग हल ढोर।।1।। पावस की बलि‍हारि‍ है पोखर सर हरसाय। बरखा शीतल पवन संग, हर तरवर लहराय।।2।। क्‍यूँ दादुर …

गुरुवे नम:

अक्षर ज्ञान दि‍वाय कै, उँगली पकड़ चलाय। पार लगावै गुरु ही या, केवट पार लगाय।।1।। बन गुरुत्‍व धरती नहीं, धुर बि‍न चलै न काक। गुरुजल बि‍न संयंत्र परम, गुरु …

काक बखान

कोयल कौ घर फोर कै, घर घर कागा रोय। घड़ि‍यल आँसू देख कै, कोउ न वाकौ होय।।1।। बड़-बड़ बानी बोल कै, कागा मान घटाय। कोऊ वाकौ यार है, ‘आकुल’ …

पि‍तृ महि‍मा

माता कौ वह पूत है, पत्‍नी कौ भरतार। बच्‍चन कौ वह बाप है, घर में वो सरदार।।1।। पालन पोषण वो करै, घर रक्‍खै खुशहाल। देवै हाथ बढ़ाय कै, सुख …

मधुबन माँ की छाँव

‘आकुल’ या संसार में, एक ही नाम है माँ। अनुपम है संसार के, हर प्राणी की माँ।।1।। माँ की प्रीत बखानि‍ए, का मुँह से धनवान। कंचन तुला भराइये, ओछो …

गणेशाष्‍टक

धरा सदृश माता है, माँ की परि‍क्रमा कर आये। एकदन्‍त, गणनायक, गणपि‍त प्रथम पूज्‍य कहलाये।।1।। लाभ-क्षेम, दो पुत्र, ऋद्धि‍-सि‍द्धि‍ के स्‍वामि‍ गजानन। अभय और वर मुद्रा से करते कल्‍याण …

दरख्‍़त धूप को साये में

दरख्‍़त धूप को साये में ढाल देता है मुसाफ़ि‍र को रुकने का ख़याल देता है पत्‍तों की ताल,हवा के सुरों में झूमती शाख़ों पे परि‍न्‍दा आशि‍याँ डाल देता है …

इस शहर में कोई

इस शहर में कोई हमसे ख़फ़ा है। या तो मैं बेवफ़ा हूँ या वो बेवफ़ा है। हर शख्‍़स यहाँ मुज़ब्‍ज़ब में है जी रहा, और जि‍ये जा रहा है अजब फ़लसफ़ा …

करम कर तू ख़ुदा को

करम कर तू ख़ुदा को रहमान लगता है। कोई ना ति‍रा मि‍रा जो मि‍हरबान लगता है। यही पैग़ाम गीता में हदीस में है पाया, ग़ुमराह कि‍या हुआ वो इनसान …

कुछ इस तरह मनायें छब्‍बीस जनवरी इस बार

सुधाकर अमृतवर्षा,दिवाकर रश्मिमणि बिखेरे इस बार। स्वाति गिरे, धरा कुमकुम का शृंगार करे इस बार। क्षितिज पर फहराये, विजयी विश्व तिरंगा इस बार। कुछ इस तरह मनायें छब्बीस जनवरी …

अंजामे गुलि‍स्‍ताँ क्‍या होगा

हर शाख़ पे उल्‍लू बैठा है,अंजामे गुलि‍स्‍ताँ क्‍या होगा? जि‍सने न सहा हो दर्दे ख़ि‍ज़ाँ,गुलज़ार पशेमाँ क्‍या होगा? उस बीते युग की बात करें क्‍या,आज़ादी के दीवानों की। ग़दर …

पत्‍थरों का शहर (कविता)

यह पत्‍थरों का शहर है बेजान बुत सा खड़ा, इसके सीने में भरा गु़बारों का ज़हर है। यह पत्‍थरों का शहर है। यहाँ पलती है ज़ि‍न्‍दगी नासूर सी, यहाँ …

याद बहुत ही आती है तू

याद बहुत ही आती है तू, जब से हुई पराई। कोयल सी कुहका करती थी, घर में सोन चि‍राई। अनुभव हुआ एक दि‍न तेरी, जब हो गई वि‍दाई। अमरबेल …

यह शहर

ति‍नका ति‍नका जोड़ रहा मानव यहाँ शाम-सहर। आतंकी साये में पीता हालाहल यह शहर। अनजानी सुख की चाहत संवेदनहीन ज़मीर इंद्रधनुषी अभि‍लाषायें बि‍न प्रत्‍यंचा बि‍न तीर महानगर के चक्रव्‍यूह …

तुम सृजन करो

तुम सृजन करो मैं हरि‍त प्रीत शृंगार सजाऊँगा। वसुंधरा को धानी चूनर भी पहनाऊँगा। देखें होंगे स्‍वप्‍न यथार्थ में जीने का है वक्‍़त, ग्रामोत्‍थान और हरि‍त क्रांति‍ की अलख …

भारत मेरा महान्

उन्‍नत भाल हि‍मालय सुरसरि‍ गंगा जि‍सकी आन। उन्‍मुक्‍त ति‍रंगा शान्‍ति‍ दूत बन देता है संज्ञान। चक्र सुदर्शन सा लहराये करता है गुणगान। चहूँ दि‍शा पहुँचेगी मेरे भारत की पहचान।। …

आती है दि‍न रात हवा

दीवाने की मीठी यादें, लाती है दि‍न-रात हवा। मेरे शहर से चुपके-चुपके, जाती है दि‍न-रात हवा। ति‍तली बन कर, जुगनू बन कर, आती है दि‍न रात हवा। सूना पड़ा …

भ्रष्‍टाचार खत्‍म करने को

आओ हाथ हृदय पर रख, कुछ क्षण सोचें हम थोड़े हम भी इसमें‍, जि‍म्मेदार हैं, सोचें हम फि‍र नि‍र्णय लें, पश्चात्ताप करें या प्रायश्चित या भ्रष्टाचार खत्म करने को,जड़ …

मत कर नारी का अपमान

अब भी सम्हल जा मत कर नारी का अपमान। लोक-संस्कृति‍ समृद्ध इसी से है नादान।। कुलदेवी,कुल की रक्षक,कुल गौरव है। बहि‍न-बहू-माता-बेटी यही सौरव है। वंश चलाने को वो बेटा-बेटी …

आने वाला कल

आने वाला कल ढेरों सौगात लि‍ए आये। सुख समृद्धि‍,वैभव,अमन की बात लि‍ए आये। प्रगति‍ पथ पर चल अडि‍ग स्‍थापि‍त हो हर करम, संघर्ष कर कैसा भी वक्‍त झंझावात लि‍ए …

आधारशि‍ला रखना है

परि‍वर्तन की एक नई आधारशि‍ला रखना है। न्‍याय मि‍ले बस इसीलि‍ए आकाश हि‍ला रखना है। द्रवि‍त हृदय में मधुमय इक गु़लजार खि‍ला रखना है। हर दम संकट संघर्षों में …

मंगलमय हो

मंगलमय हो स्वतंत्रता का स्वर्णि‍म पावन पर्व। जन-जन को पुलकि‍त कर दे ऐसा मनभावन पर्व। नये जोश और नई उमंगों का प्रति‍पादन पर्व। अमर शहीदों की स्मृति‍ का यह …

मेरे देश में

मेरे देश में हर दि‍न त्योहार। दि‍न दूना और रात चौगुना बढ़ता जाये प्यार। मेरे देश में हर दि‍न त्योहार।। महक उठा मन सौंधी खुशबू जो लाई पुरवाई। धानी …

धरती को हम स्‍वर्ग बनायें

आओ अब सौगंध यह खायें। धरती को हम स्वर्ग बनायें।। स्वच्छ‍ धरा हर मार्ग स्वच्छ हो। गली-गली हर मार्ग वृक्ष हो। वन,उपवन,कानन सब झूमें। नभ-जल-थल के प्राणी झूमें। महाशक्ति …

माँ

माँ आँखों से ओझल होती, आँखें ढूँढ़ा करती रोती। वो आँखों में स्‍वप्‍न सँजोती, हर दम नींद में जगती सोती। वो मेरी आँखों की ज्‍योति‍, मैं उसकी आँखों का …