Category: गोपाल गुंजन

आदमी

आदमी /जीता है जिन्दगी अपने पुरे होश-हवाश में एक-एक कर /हर ठिकाने पर रुकता है सम्भलता है ,फिर /बढता है आगे |   साथ-साथ उसके /चलता है उसका भूत …

जख्म

आवादी के दलदल में /धंसे पैर लेकर उबरने की कोशिश में और धंसता जा रहा है /आहत देश | ह्रदय की कन्दराओं में /स्निग्ध प्यार की जगह घुटन ,कुंठा …

वह

खोजते –खोजते मैंने/ उसे उस दिन पा लिया | मैंने खुशी से हाथ मिलाने की/ कोशिश की उसने अपनी आँखें /दहक रही भट्ठी की तरह लाल कर ली | …

मेरी कविताएँ

सोचा था मैंने अब नहीं लिखूँगा कविताएँ टूटन की ,घुटन की /लावारिस आँखों के सपनों की सामाजिक विवशताओं की /जलती हुई हसरतों की बुझती हुई विश्वास की /अब नहीं …