Category: गिरिराज शरण अग्रवाल

संसार : नियति

मधुस्नेह हो गया स्वप्नमय भाव हृदय के सूने घट में हो विलीन सब दुख के राग सुनाते गाते पीड़ा के अभिशाप व्याल-से काल-भाल को डसते जाते और आह के …

राजनीति में जीते हुए

राजनीति में भाई-भतीजावाद का मुहावरा अब पुराना पड़ गया है; ऐसा लगता है कि अब हम स्वयं राजनीति हो गए हैं और राजनीति केवल हमसे ही चलती है; कहीं …

बच्चों के बीच

कितना अच्छा लगता है सब कुछ भूलकर बच्चों के बीच बैठना; उन्हें देखना जी भरके, उनसे बातें करना उन्हें पुचकारना और उनकी जीत में ही अपनी जीत मानकर सब …

प्रश्न

क्या मेरा चोटी पर चढ़ना ज़रूरी है जबकि मेरे टाँगें ही नहीं हैं । किसी से उधार ली हुई कृत्रिम टाँगों को अथवा झूठ की बैसाखियों को लेकर मैं …

आकांक्षा

मैं तुम्हारी आँखों में झाँकूँ और झाँकता ही रहूँ । मैं तुम्हारी आँखों की गहराई नापूँ और नापता ही रहूँ । तुम्हारे आकाश को बाँहों में अपनी भर लूँ …