Category: गिरीराज किराडू

मातृभाषा-मृतभाषा

राजस्थानी कवि और मित्र नीरज दइया के लिए वह कुछ इतने सरल मन से, लेकिन थोड़ा शर्मसार खुद पर हंसते हुए यह बात बोल गया कि यकीन नहीं हुआ …

एकान्त

चाचा ने जब गोदो किया दुखी रहे थे बहुत दिनों तक कोर्ट मार्शल करते हुए बहुत उद्विग्न जब किया एवम् इन्द्रजित तो अपना नाम इन्द्रजित मोहन रख लिया और …

मादाम बोवारी से क्षमा

वह मादाम बोवारी का अभिनय कर रही है बिल्कुल अंतिम दृश्य है विष उसके शरीर में फैल रहा है वह क्षमा मांगती है यह देखते हुए मैं उसके पति …

कहानी के फेर में

हिरामन तीन कसमें खाता है फिर किसी कहानी का सुपात्र नहीं बनूंगा फिर किसी कहानीकार को अपने बारे में नहीं लिखने दूंगा फिर किसी कहानी में अपना ही पार्ट …

डॉन किख़ोते का रचयिता, पियरे मेनार्ड

पियरे मेनार्ड एक किताब लिखना चाहता है पर पहली मुश्किल तो यही कि वो ख़ुद कोई नहीं उसकी जीवनी तो शायद है कोई जीवन नहीं दूसरी यह कि वह …

बादशाह मैकबैथ

(कवि अरूण कमल के लिये) क्या हुआ बैंको के बेटे का शेक्सपीयर हमें नहीं बताता – कुछ समझे बादशाह? उसकी कोई दिलचस्पी नहीं चुड़ैलों के बताये भविष्य में, तुम्हें …

आप ख़ुशकिस्मत हैं

आप ख़ुशकिस्मत हैं कि चीख़ सकेंगे जब पूरा संसार किसी उलझे हुए उड़नखटोले से लटक कर किसी और आकाशगंगा में बसने के लिए फ़रार होने की कोशिश कर रहा …

अंधेरा और रोशनी-3

“जिसे बुहार कर रख दिया उसे कहीं सम्भाल कर भी रक्खा या नहीं ? क्या पता उसी में चली गई हों वे आख़िरी तीलियाँ भी !” “तुम्हें कितनी बार कहा है …

मनदीप कौर-2

इसमे कोई रहस्य नहीं की इसी रास्ते पर तुम्हें पुरस्कार मुझे दंड मिल जाएगा किंतु सावधान! इसी रास्ते पर पुरस्कार श्राप दंड वरदान हो जाएगा यूं कोई संशय नहीं …

मनदीप कौर-1

सामने हवा होती है और दूर तक फैली पृथ्वी अपने को पूरा झोंककर मैं दौड़ती हूँ हवा के ख़िलाफ़ और किसी प्रेत निश्चय से लगाती हूँ छलांग, उसी हवा …

मेज इतनी पुरानी थी

मेज इतनी पुरानी थी कि उसका कोई वर्तमान नहीं था हमारे बच्चे इतने नये थे कि उनका कोई अतीत नहीं था बच्चों का अतीत हमारे पाप में छुपा था …

चार सौ विवाह और दो अन्तिम संस्कार

कैसे देखते होंगे दो शव उन चार सौ विवाह उत्सवों को जिनकी रौनक के बीच सेगुजर कर उन्हें शमशान तक पहुंचाना है। कैसे देखती होंगी पान की दुकानें शवों …

सारी दुनिया रंगा

जूते न हुई यात्राओं की कामना में चंचल हो उठते थे हमने उन पर बरसों से पॉलिश नहीं की थी धरती न हुई बारिशों की प्रतीक्षा में झुलसती थी …

इस पूरी संरचना से बाहर

हमने उन्हें आकाश में ठीक हमारे सिर पर मंडराते देखा था। जैसे पृथ्वी पर घूमने वाला नेपाली एक महीने में एक बार दस रुपये लेने आता है वैसे ही …