Category: गिरिजाकुमार माथुर

भीगा दिन

भीगा दिन पश्चिमी तटों में उतर चुका है, बादल-ढकी रात आती है धूल-भरी दीपक की लौ पर मंद पग धर। गीली राहें धीरे-धीरे सूनी होतीं जिन पर बोझल पहियों …

नया बनने का दर्द

पुराना मकान फिर पुराना ही होता है -उखड़ा हो पलस्तर खार लगी चनखारियाँ टूटी महरावें घुन लगे दरवाजे सील भरे फर्श, झरोखे, अलमारियाँ -कितनी ही मरम्मत करो चेपे लगाओ …

नया कवि

जो अंधेरी रात में भभके अचानक चमक से चकचौंध भर दे मैं निरंतर पास आता अग्निध्वज हूँ कड़कड़ाएँ रीढ़ बूढ़ी रूढ़ियों की झुर्रियाँ काँपें घुनी अनुभूतियों की उसी नई …

ढाकबनी

लाल पत्थर लाल मिटृटी लाल कंकड़ लाल बजरी लाल फूले ढाक के वन डाँग गाती फाग कजरी सनसनाती साँझ सूनी वायु का कंठला खनकता झींगुरों की खंजड़ी पर झाँझ-सा …

दो पाटों की दुनिया

दो पाटों की दुनिया चारों तरफ शोर है, चारों तरफ भरा-पूरा है, चारों तरफ मुर्दनी है, भीड और कूडा है। हर सुविधा एक ठप्पेदार अजनबी उगाती है, हर व्यस्तता …

छाया मत छूना

छाया मत छूना मन होता है दुख दूना मन जीवन में हैं सुरंग सुधियाँ सुहावनी छवियों की चित्र-गंध फैली मनभावनी; तन-सुगंध शेष रही, बीत गई यामिनी, कुंतल के फूलों …

चूड़ी का टुकड़ा

आज अचानक सूनी-सी संध्या में जब मैं यों ही मैले कपड़े देख रहा था किसी काम में जी बहलाने एक सिल्क के कुर्ते की सिलवट में लिपटा गिरा रेशमी …

आज हैं केसर रंग रंगे वन

आज हैं केसर रंग रंगे वन रंजित शाम भी फागुन की खिली खिली पीली कली-सी केसर के वसनों में छिपा तन सोने की छाँह-सा बोलती आँखों में पहले वसन्त …

बरसों के बाद कहीं

बरसों के बाद कहीं बरसों के बाद कभी हमतुम यदि मिलें कहीं, देखें कुछ परिचित से, लेकिन पहिचानें ना। याद भी न आये नाम, रूप, रंग, काम, धाम, सोचें, …