Category: घनश्याम कुमार ‘देवांश’

जब तुम चली जाओगी

जब तुम चली जाओगी तुम्हारी गली में सूरज तब भी उगेगा यथावत, चाँद सही समय पर दस्तक देना नहीं भूलेगा, फूल खिलना नहीं छोड़ देंगे, हवाओं में ताजगी तब …

इससे पहले कि

सूरज के डूबने और उगने के बीच मैं तैयार कर लेना चाहता हूँ रौशनी के मुट्ठी भर बीज जिन्हें सवेरा होते ही दफना सकूँ मैं धरती के सबसे उर्वर …

इन पहाड़ों पर….-3

तवांग के ख़ूबसूरत पहाड़ों से उपजते हुए… वो आसमान जिसने भरे हुए महानगर में दौड़ाया था मुझे जो अपने महत्त्वाकाँक्षी दरातों से रोज़ मेरी आत्मा में एक खाई चीरता …

इन पहाड़ों पर….-1

तवांग के ख़ूबसूरत पहाड़ों से उपजते हुए… सामने पहाड़ दिनभर बादलों के तकिए पर सर रखे ऊँघते हैं और सूरज रखता है उनके माथे पर नरम-नरम गुलाबी होंठ तेज़ …

अप्रैल-फूल

सिर्फ़ तुम्हारी बदौलत भर गया था अप्रैल विराट उजाले से हो रही थी बरसात अप्रैल की एक ख़ूबसूरत सुबह में चाँद के चेहरे पर नहीं थी थकावट रातों के …