Category: गयाप्रसाद शुक्ल ‘सनेही’

पावन प्रतिज्ञा

चरखे चलाएंगे, बनाएंगे स्वेदशी सूत कपड़े बुनाएंगे, जुलाहों को जिलाएंगे चाहेंगे न चमक-दमक चिर चारुताई अपने बनाए उर लाय अपनाएंगे पाएंगे पवित्र परिधान, पाप होंगे दूर जब परदेशी-वस्त्र ज्वाला …

परतंत्रता की गाँठ

बीतीं दासता में पड़े सदियाँ, न मुक्ति मिली पीर मन की ये मन ही मन पिराती है देवकी-सी भारत मही है हो रही अधीर बार-बार वीर ब्रजचन्द को बुलाती …

कोयल

काली कुरूप कोयल क्या राग गा रही है, पंचम के स्वर सुहावन सबको सुना रही है। इसकी रसीली वाणी किसको नहीं सुहाती? कैसे मधुर स्वरों से तन-मन लुभा रही …