Category: गौतम राजरिशी

है मुस्कुराता फूल कैसे तितलियों से पूछ लो

है मुस्कुराता फूल कैसे तितलियों से पूछ लो जो बीतती काँटों पे है, वो टहनियों से पूछ लो लिखती हैं क्या किस्से कलाई की खनकती चूडि़याँ सीमाओं पे जाती …

हुई राह मुश्किल तो क्या कर चले

हुई राह मुश्किल तो क्या कर चले क़दम-दर-क़दम हौसला कर चले उबरते रहे हादसों से सदा गिरे, फिर उठे, मुस्कुरा कर चले लिखा ज़िंदगी पर फ़साना कभी कभी मौत …

हवा जब किसी की कहानी कहे है

हवा जब किसी की कहानी कहे है नये मौसमों की ज़ुबानी कहे है फ़साना लहर का जुड़ा है ज़मीं से समन्दर मगर आसमानी कहे है कटी रात सारी तेरी …

हरी है ये ज़मीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं

हरी है ये ज़मीं हमसे कि हम तो इश्क बोते हैं हमीं से है हँसी सारी, हमीं पलकें भिगोते हैं धरा सजती मुहब्बत से, गगन सजता मुहब्बत से मुहब्बत …

हर लम्हा इस मन में इक तस्वीर यही तो सजती है

हर लम्हा इस मन में इक तस्वीर यही तो सजती है तू बैठी है सीढ़ी पर, छज्जे से धूप उतरती है एक सवेरा इक तन्हा तकिये पर आँखें मलता …

हमारे हौसलों को ठीक से जब जान लेते हैं

हमारे हौसलों को ठीक से जब जान लेते हैं अलग ही रास्ते फिर आँधियाँ-तूफ़ान लेते हैं बहुत है नाज़ रुतबे पर उन्हें अपने, चलो माना कहाँ हम भी किसी …

सीखो आँखें पढ़ना साहिब

सीखो आँखें पढ़ना साहिब होगी मुश्क़िल वरना साहिब सम्भल कर तुम दोष लगाना उसने खद्‍दर पहना साहिब तिनके से सागर नापेगा रख ऐसे भी हठ ना साहिब दीवारें किलकारी …

राह में चांद उस रोज़ चलता मिला

राह में चांद उस रोज़ चलता मिला दिल का मौसम चमकता, दमकता मिला देखना छुप के जो देख इक दिन लिया फिर वो जब भी मिला तो झिझकता मिला …

रात भर चाँद को यूँ रिझाते रहे

रात भर चाँद को यूँ रिझाते रहे उनके हाथों का कंगन घुमाते रहे इक विरह की अगन में सुलगते बदन करवटों में ही मल्हार गाते रहे टीस, आवारगी, रतजगे, …

ये बाजार सारा कहीं थम न जाये

ये बाजार सारा कहीं थम न जाये न गुजरा करो चौक से सर झुकाये कोई बंदगी है कि दीवानगी ये मैं बुत बन के देखूँ, वो जब मुस्कुराये समंदर …

ये तेरा यूं मचलना क्या

ये तेरा यूँ मचलना क्या मेरे दिल का तड़पना क्या निगाहें फेर ली तू ने दिवानों का भटकना क्या सुबह उतरी है गलियों में हर इक आहट सहमना क्या …

पूछे तो कोई ये जाकर

पूछे तो कोई जाकर ये कुनबों के सरदारों से हासिल क्या होता है आखिर जलसों से या नारों से रोजाना ही खून-खराबा पढ़ कर ऐसा हाल हुआ सहमी रहती …

देख पंछी जा रहे अपने बसेरों में

देख पंछी जा रहें अपने बसेरों में चल, हुई अब शाम, लौटें हम भी डेरों में सुब्‍ह की इस दौड़ में ये थक के भूले हम लुत्फ़ क्या होता …

निगाहों से ज़रा सा

निगाहों से जरा-सा वो करे यूँ वार चुटकी में हिले ये सल्तनत सारी, गिरे सरकार चुटकी में न मंदिर की ही घंटी से, न मस्जिद की अज़ानों से करे …

दूर क्षितिज पर सूरज चमका,सुब्‍ह खड़ी है आने को

दूर क्षितिज पर सूरज चमका,सुब्‍ह खड़ी है आने को धुंध हटेगी,धूप खिलेगी,साल नया है छाने को प्रत्यंचा की टंकारों से सारी दुनिया गुंजेगी देश खड़ा अर्जुन बन कर गांडिव …

तू जो मुझसे जुदा नहीं होता

तू जो मुझसे जुदा नहीं होता मैं ख़ुदा से ख़फ़ा नहीं होता ये जो कंधे नहीं तुझे मिलते तो इतना तू बड़ा नहीं होता सच की ख़ातिर न खोलता …

तू जब से अल्लादिन हुआ

तू जब से अल्लादिन हुआ मैं इक चरागे-जिन हुआ भूलूँ तुझे? ऐसा तो कुछ होना न था, लेकिन हुआ पढ़-लिख हुए बेटे बड़े हिस्से में घर गिन-गिन हुआ काँटों …

जल चुकी है फ़स्‍ल सारी पूछती अब आग क्या

जल चुकी है फ़स्‍ल सारी पूछती अब आग क्या राख पर पसरा है “होरी”, सोचता निज भाग क्या ड्योढ़ी पर बैठी निहारे शह्‍र से आती सड़क “बन्तो” की आँखों …

जब छेड़ा मुजरिम का क़िस्सा

जब छेड़ा मुजरिम का किस्सा चर्चित था हाकिम का किस्सा जलती शब भर आँधी में जो लिख उस लौ मद्‍धिम का किस्सा सुन लो सुन लो पूरब वालों सूरज …

चीरती-सी जाती है अब ये घर की ख़ामोशी

बस गयी है रग-रग में बामो-दर की ख़ामोशी चीरती-सी जाती है अब ये घर की ख़ामोशी सुब्‍ह के निबटने पर और शाम ढलने तक कितनी जानलेवा है दोपहर की …

चीड़ के जंगल खड़े थे देखते लाचार से

चीड़ के जंगल खड़े थे देखते लाचार से गोलियाँ चलती रहीं इस पार से उस पार से मिट गया इक नौजवां कल फिर वतन के वास्ते चीख तक उट्ठी …