Category: गंगाधर ढोके

जिन दरख्तों की गहरी जड़े हैं

जिन दरख्तों की गहरी जड़े हैं वे आँधियों में तनके खड़े हैं के बारां से मुझको डरा मत तेरे घर भी कच्चे घड़े हैं सच इन्सां से लगने लगे …

प्रेम

चूक जाने के बाद भी बचा रहता है कजरौटे में अंजन जैसे सूखने के बाद नदी की रेत में बची रहती है नमी घोंसले में शेष रह जाते हैं पक्षियों  के पंख तुम्हारे जाने के बाद भी बचे हैं स्मृतियों के अवशेष जैसे बन्जारे  छोड़  जाते हैं खुली जमीन में अपने बसाहट के चिह्न  

पेड़

पेड़ सिर्फ पेड़ नहीं होते वे होते है घर के पते की तरह उन दिनों जब गांव में नहीं हुआ करते थे बिजली दतर, डाकघर तब पेड़ से ही …

सांझ

सारा दिन मुंहलगी चिडि़यों को खदेड़ने के बाद लौटते होंगे पिता खेत से नंगे पांव गांव में पसरी होगी सांझ पकती होगी चिन्ताएं फसल के साथ-साथ बैंक का कर्ज …