Category: गणेश पाण्डेय

यह अटाला ही अब जिसका ठिकाना है

कहाँ हो तुम उजाले में हो कि किसी अँधेरे में बोलो अकेले में हो कि किन्हीं अपनों के बीच कि यादों के किसी तहख़ाने में बंदी किसी छत के …

बहुत उदास हूँ आज की रात

किससे कहूँ कि मुझे बताए अभी कितने फेरे लेने होंगे वापस जीवन की किसी उलझी हुई गाँठ को सुलझाने के लिए जो खो गया है उसे दुबारा पाने के …

पितृपक्ष

जैसे रिक्शेवाले भाई ने किया याद पूछा जैसे जूतों की मरम्मत करनेवाले ने जैसे दिया जल-अक्षत सामनेवाले भाई ने जैसे दिया ज्ञानियों ने और कम ज्ञानियों ने जैसे किया …

धर्मशाला बाज़ार के आटो लड़के

वे दूर से देखते थे और पहचान लेते थे मद्धिम होता मेरा प्याजी रंग का कुर्ता थाम लेते थे बढ़कर कंधे से मेरा वही पुराना आसमानी रंग का झोला …

जो उसके पास हुआ मुझसे बड़ा दुख

इस घर से जो निकलना ही हुआ तो किधर ले चलेंगे मुझे मेरे क़दम कहीं तो रुकेंगे कोई ठिकाना देखकर किस घर के सामने रुकेंगे ये पैर अब इस …

ज़मीनख़ोर

वे ज़मीनख़ोर थे चाहते थे औने-पौने दाम पर कस्बे की मेरी पुश्तैनी ज़मीन मेरा पुराना दुमंज़िला मकान वे चाहते थे मैं उच्छिन्न हो जाऊँ यहाँ से अपने बीवी-बच्चों पेड़-पौधों …

गुरु से बड़ा था गुरु का नाम

गुरु से बड़ा था गुरु का नाम सोचा मैं भी रख लूँ गुरु से बड़ा नाम कबीर तो बहुत छोटा रहेगा कैसा रहेगा सूर्यकांत त्रिपाठी निराला अच्छा हो कि …

कैसे निकलूँ सोती हुई यशोधरा को छोड़कर

कैसे निकलूँ इस घर से सोती हुई यशोधरा को छोड़कर कितनी गहरी है यशोधरा की नींद एक स्त्री की तीस बरस लंबी नींद नींद भी जैसे किसी नींद में …

कहाँ जान पाते हैं सब लोग

नाती-पोतों की दुनिया में मगन दादियों और नानियों की थुलथुल टोली की वह नायिका इतनी वयस्त है कि भूल गई है काफ़ी समय से बंद खिड़कियों को खोलना वक़्त …

कहाँ जलाओगे मेरी देह

कहाँ जलाओगे मेरी देह ओ जलाने वाले शिव की नगरी के गंगातट पर जहाँ कोई नहीं जानता है मुझे काशी नरेश से लेकर मामूली से मामूली आदमी तक कि …

ओ केरल की उन्नत ग्रामबाला

कहाँ फेंका था तुमने अपना वह माउथ आर्गन जिस पर फ़िदा थीं तुम्हारी सखियाँ कहाँ गुम हुईं सखियाँ किस मेले-ठेले में किसके संग कैसे तहाकर रख दिया होगा तुमने …

ओ ईश्वर

ओ ! ईश्वर तुम कहीं हो और कुछ करते-धरते हो तो मुझे फिर मनुष्य मत बनाना मेरे बिना रुकता हो दुनिया का सहज प्रवाह ख़तरे में हो तुम्हारी नौकरी चाहे …

उस चाँद से कहना

तुम्हारे उड़ने के लिए है यह मन का खटोला खास तुम्हारे लिए है यह स्वप्निल नीला आकाश विचरण के लिए आकाश का सुदूर चप्पा-चप्पा सब तुम्हारे लिए है तनिक-सी …

उठो यशोधरा ! तुम्हारा प्यार सो रहा है

कैसे जगाऊँगा उसे जिसे जागना नहीं आता प्यार से छूकर कहूँगा उठने के लिए कि चूमकर कहूँगा हौले से जागो यशोधरा ! देखो कबसे जाग रही है धरा कबसे चल …

इतनी अच्छी क्यों हो चंदा

तुम अच्छी हो तुम्हारी रोटी अच्छी है तुम्हारा अचार अच्छा है तुम्हारा प्यार अच्छा है तुम्हारी बोली-बानी तुम्हारा घर-संसार अच्छा है तुम्हारी गाय अच्छी है उसका थन अच्छा है …

आत्मा का एकांत आलाप

अजीब आदमी है ढलान से उतरते हुए मुड़-मुड़ कर आकाश में चाँद को देखता है इतने बड़े आकाश में चाँद को अकेला देखता है देखता है कैसे कहीं गिर …