Category: फ़िराक़ गोरखपुरी

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं

बहुत पहले से उन क़दमों की आहट जान लेते हैं तुझे ए ज़िन्दगी, हम दूर से पहचान लेते हैं। मेरी नजरें भी ऐसे काफ़िरों की जान ओ ईमाँ हैं …

निगाहें नाज़ ने पर्दे उठाए हैं

निगाहें नाज़ ने पर्दे उठाए हैं क्या-क्या । हिजाब अहले मुहब्बत को आए हैं क्या-क्या ।। जहाँ में थी बस इक अफ़वाह तेरे जलवों की, चराग़े दैरो-हरम झिलमिलाए है …

तुम्हीं ने बायसे-ग़म बारहा किया दरयाफ़्त

तहों में दिल के जहां कोई वारदात हुई हयाते-ताज़ा से लबरेज़ कायनात हुई तुम्हीं ने बायसे-ग़म बारहा किया दरयाफ़्त कहा तो रूठ गये यह भी कोई बात हुई हयात …

तहों में दिल के जहां कोई वारदात हु

तहों में दिल के जहां कोई वारदात हुई हयाते-ताज़ा से लबरेज़ कायनात हुई तुम्हीं ने बायसे-ग़म बारहा किया दरयाफ़्त कहा तो रूठ गये यह भी कोई बात हुई हयात …

ख़ुदनुमा होके निहाँ छुप के नुमायाँ होना

ख़ुदनुमा होके निहाँ छुप के नुमायाँ होना अलग़रज़ हुस्न को रूसवा किसी उनवाँ1 होना यूँ तो अकसीर है ख़ाके-दरे-जानाँ लेकिन काविशे-ग़म2 से उसे गर्दिशे-दौराँ होना हद्दे-तमकीं से न बाहर हुई खु़द्दार …

ग़ैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं

गैर क्या जानिये क्यों मुझको बुरा कहते हैं आप कहते हैं जो ऐसा तो बज़ा कहते हैं वाकई तेरे इस अन्दाज को क्या कहते हैं ना वफ़ा कहते हैं …

छलक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहीं

छ्लक के कम न हो ऐसी कोई शराब नहीं निगाहे-नरगिसे-राना, तेरा जवाब नहीं ज़मीन जाग रही है कि इन्क़लाब है कल वो रात है कि कोई ज़र्रा भी महवे-ख़्वाब …

तमाम कैफ़ ख़मोशी तमाम नग़्म-ए-साज़

तमाम कैफ़ ख़मोशी तमाम नग़्म-ए-साज़ नवा-ए-राज़ है ऐ दोस्त या तेरी आवाज़ मेरी ग़ज़ल में मिलेगा तुझे वो आलमे-राज़ जहां हैं एक अज़ल से हक़ीक़त और मजाज़ वो ऐन …

छिड़ गये साज़े-इश्क़ के गाने

छिड़ गये साज़े-इश्क़ के गाने खुल गये ज़िन्दगी के मयख़ाने आज तो कुफ्रे-इश्क़े चौंक उठा आज तो बोल उठे हैं दीवाने कुछ गराँ1 हो चला है बारे-नशात आज दुखते हैं …

जब नज़र आप की हो गई है

जब नजर आप की हो गई है ज़िन्दगी, ज़िन्दगी हो गई है बारहा बर-खिलाफ़-ए-हर-उम्मीद दोस्ती, दुश्मनी हो गई है है वो तकमील पुरकारियों की जो मेरी सादगी हो गई …

क्यों तेरे ग़म-ए-हिज्र में

क्यों तेरे ग़म-ए-हिज्र में नमनाक हैं पलकें क्यों याद तेरी आते ही तारे निकल आए बरसात की इस रात में ऐ दोस्त तेरी याद इक तेज़ छुरी है जो उतरती चली …

किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी

किसी का यूं तो हुआ कौन उम्र भर फिर भी ये हुस्न-ओ-इश्क़ तो धोका है सब, मगर फिर भी हजार बार ज़माना इधर से गुजरा नई नई है मगर …

कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम

कुछ इशारे थे जिन्हें दुनिया समझ बैठे थे हम उस निगाह-ए-आशना को क्या समझ बैठे थे हम रफ़्ता रफ़्ता ग़ैर अपनी ही नज़र में हो गये वाह री ग़फ़्लत …

कभी पाबंदियों से छुट के भी दम घुटने लगता है

कभी पाबन्दियों से छुट के भी दम घुटने लगता है दरो-दीवार हो जिनमें वही ज़िन्दाँ नहीं होता हमारा ये तजुर्बा है कि ख़ुश होना मोहब्बत में कभी मुश्किल नहीं …

उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगी

उस ज़ुल्फ़ की याद जब आने लगी इक नागन-सी लहराने लगी जब ज़ि‍क्र तेरा महफ़ि‍ल में छिड़ा क्यों आँख तेरी शरमाने लगी क्या़ मौजे-सबा थी मेरी नज़र क्यों ज़ुल्फ़ …

इस सुकूते ‍फ़िज़ा में खो जाएं

इस सुकूते ‍फ़िज़ा में खो जाएं आसमानों के राज हो जाएं हाल सबका जुदा-जुदा ही सही किस पॅ हँस जाएं किस पॅ रो जाएं राह में आने वाली नस्लों …