Category: द्विजेन्द्र ‘द्विज’

जबकि नारों में यहाँ हैं लाख उजियारे हुए

जबकि नारों में यहाँ हैं लाख उजियारे हुए क्यों अँधेरे ही मगर फिर आँख के तारे हुए ज़ात,मज़हब,रंग,नस्लें और फ़िरक़े हो गया आदमी था एक जिसके लाख बँटवारे हुए …

ख़ुद भले ही झेली हो त्रासदी पहाड़ों ने

ख़ुद भले ही झेली हो त्रासदी पहाड़ों ने बस्तियों को दे दी है हर ख़ुशी पहाड़ों ने ख़ुद तो जी हमेशा ही तिश्नगी पहाड़ों ने सागरों को दी लेकिन …

कोई बरसता रहा बादलों की भाषा में

कोई बरसता रहा बादलों की भाषा में कोई तरसता रहा मरुथलों की भाषा में ज़ुबान होश की उसको समझ नहीं आती बहक रही है सदी, मनचलों की भाषा में …

कहाँ पहुँचे सुहाने मंज़रों तक

कहाँ पहुँचे सुहाने मंज़रों तक वो जिनका ध्यान था टूटे परों तक जिन्हें हर हाल में सच बोलना था पहुँचना था उन्हीं को कटघरों तक लकीरों को बताकर साँप …

औज़ार बाँट कर ये सभी तोड़—फोड़ के

औज़ार बाँट कर ये सभी तोड़—फोड़ के रक्खोगे किस तरह भला दुनिया को जोड़ के ख़ूँ से हथेलियों को ही करना है तर—ब—तर पानी तो आएगा नहीं पत्थर निचोड़ …

उस आदमी का ग़ज़लें कहना क़ुसूर होगा

उस आदमी का ग़ज़लें कहना क़ुसूर होगा दुखती रगों को छूना जिसका शऊर होगा गर्दन झुकाएगा जो, न तो जी-हु़ज़ूर होगा उनकी नज़र में यारो! वही बे-शऊर होगा दीमक …

इसी तरह से ये काँटा निकाल देते हैं

इसी तरह से ये काँटा निकाल देते हैं हम अपने दर्द को ग़ज़लों में ढाल देते हैं हमारी नींदों में अक्सर जो डालती हैं ख़लल वो ऐसी बातों को …

आपने इतना दिया है ध्यान सड़कों पर

आपने इतना दिया है ध्यान सड़कों पर हर क़दम पर बन गए शमशान सड़कों पर हक़ उन्हें अब भी कहाँ है उनपे चलने का ज़िन्दगी जिनकी हुई क़ुर्बान सड़कों …

आइने कितने यहाँ टूट चुके हैं अब तक

आइने कितने यहाँ टूट चुके हैं अब तक आफ़रीं उन पे जो सच बोल रहे हैं अब तक टूट जाएँगे मगर झुक नहीं सकते हम भी अपने ईमाँ की …

अश्क बन कर जो छलकती रही मिट्टी मेरी

अश्क बन कर जो छलकती रही मिट्टी मेरी शोले कुछ यूँ भी उगलती रही मिट्टी मेरी मेरे होने का सबब मुझको बताकर यारो मेरे सीने में धड़कती रही मिट्टी …