Category: द्विजेन्द्र ‘द्विज’

है उजालों के सिलसिले हर-सू

हैं उजालों के सिलसिले हर-सू ‘दीप खुशियों के जल उठे हर-सू’ आँगन-आँगन में अल्पनाएँ हैं आस के फूल खिल गये हर-सू द्वार- आँगन हैं दीपमालाएँ कहकशाँ-सी दिखाई दे हर …

हर गली, हर मोड़ पर अब जा बँधे शर्तों में लोग

हर गली, हर मोड़ पर अब जा बँधे शर्तों में लोग सिर्फ़ जीने के लिए इक ज़िन्दगी क़िश्तों में लोग नट, जमूरे, दास, बँधुआ या बने कठपुतलियाँ नाचते हैं …

वो नज़र में नज़ारा नहीं है

वो नज़र में नज़ारा नहीं है और कोई तमन्ना नहीं है बात कहता है अपनी वो लेकिन उसमें सुनने का माद्दा नहीं‍ है सच बयाँ तुम करोगे भला क्या …

लौट कर आए हो अपनी मान्यताओं के खिलाफ़

लौट कर आए हो अपनी मान्यताओं के ख़िलाफ़ थे चले देने गवाही कुछ ख़ुदाओं के ख़िलाफ़ जो हमेशा हैं दुआओं प्रार्थनाओं के ख़िलाफ़ आ रही है बद्दुआ फिर उन …

ये कौन पूछता है भला आसमान से

ये कौन पूछता है भला आसमान से पंछी कहाँ गए जो न लौटे उड़ान से ‘सद्भाव’ फिर कटेगा किसी पेड़ की तरह लेंगे ये काम भी वो मगर संविधान …

ये कौन छोड़ गया इस पे ख़ामियाँ अपनी

ये कौन छोड़ गया इस पे ख़ामियाँ अपनी मुझे दिखाता है आईना झुर्रियाँ अपनी बना के छाप लो तुम उनको सुर्ख़ियाँ अपनी कुएँ में डाल दीं हमने तो नेकियाँ …

मोम—परों से उड़ना और

मोम—परों से उड़ना और इस दुनिया में रहना और आँख के आगे फिरना और पर तस्वीर में ढलना और घर से सुबह निकलना और शाम को वापस आना और …

मैं ज़िन्दगी में कभी इस क़दर न भटका था

मैं ज़िन्दगी में कभी इस क़दर न भटका था कि जब ज़मीर मुझे रास्ता दिखाता था मशीन बन तो चुका हूँ मगर नहीं भूला कि मेरे जिस्म में दिल …

मुक्तिगीत

शहर के आतंकित होंठ जब भी खुलते हैं हवाओं में पसरता है भुतहा साया तालियाँ पीटते है काले हाथ और तुम्हारे आने का समाचार स्याही-सा पुत जाता है मेरे …

मिली है ज़ेह्न—ओ—दिल को बेकली क्या

मिली है ज़ेह्न—ओ—दिल को बेकली क्या हुई है आपसे भी दोस्ती क्या कई आँखें यहाँ चुँधिया गई हैं किताबों से मिली है रौशनी क्या सियासत—दाँ ख़ुदाओं के करम से …

मिटा दे तू मेरे खेतों से खरपतवार चुटकी में

मिटा दे तू मेरे खेतों से खरपतवार चुटकी में तो फ़स्लें मेरे सपनों की भी हों तैयार चुटकी में हवा के रुख़ से वो भी हो गये लाचार चुटकी …

बुला लो पास उजाले की वो नदी फिर से

बुला लो पास उजाले की वो नदी फिर से कहो ग़ज़ल कि है अब शाम ढल रही फिर से यहाँ अँधेरों के ताजिर ये चाहते ही नहीं धुले ये …

पंख कतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है

पंख कुतर कर जादूगर जब चिड़िया को तड़पाता है सात समंदर पार का सपना , सपना ही रह जाता है ‘जयद्रथ’ हो या ‘दुर्योधन’हो सबसे उसका नाता है अब …

बाँध कर दामन से अपने झुग्गियाँ लाई ग़ज़ल

बाँध कर दामन से अपने झुग्गियाँ लाई ग़ज़ल इसलिए शायद न अबके आप को भाई ग़ज़ल आपके भाषण तो सुन्दर उपवनों के स्वप्न हैं ज़िन्दगी फिर भी हमारी क्यों …

नाम पर तहज़ीब—ओ—मज़हब के मचा हुड़दंग है

नाम पर तहज़ीब—ओ—मज़हब के मचा हुड़दंग है आदमी की आदमी से ही छिड़ी अब जंग है रोज़ हंगामों से अपना शह्र सारा दंग है और बाचने का यहाँ हर …

न वापसी है जहाँ से वहाँ हैं सब के सब

न वापसी है जहाँ से वहाँ हैं सब के सब ज़मीं पे रह के ज़मीं पर कहाँ हैं सब के सब कोई भी अब तो किसी की मुख़ाल्फ़त में …

नदी

किनारे अकेले रह कर भी किनारे नहीं होते किनारों के बीच बहती है एक नदी लाती है सन्देश सुनाती है कहानियाँ परीलोक की मरुस्थल में बहाती है पानी. किनारों …

नग़्मगी नग़्मासरा है और नग़्मों में गुहार

नग़्मगी नग़्मासरा है और नग़्मों में गुहार तुम जो आओ तो मना लें हम भी ये बरखा बहार ‘पी कहाँ है, पी कहाँ है, पी कहाँ है, पी कहाँ’ …

दिलों की उलझनों से फ़ैसलों तक

दिलों की उलझनों से फ़ैसलों तक सफ़र कितना कड़ा है मंज़िलों तक यही पहुंचाएगा भी मंज़िलों तक सफ़र पहुँचा हमारा हौसलों तक ये अम्नो—चैन की डफली ही उनकी हमें …

तू स्वादों का दास रे जोगी

जोग कठिन अभ्यास रे जोगी तू स्वादों का दास रे जोगी यह तेरा रनिवास रे जोगी जप-तप का उपहास रे जोगी हर सुविधा तुझ पास रे जोगी धत्त तेरा …

जिधर कहीं भी है ख़्वाबों का कारवाँ निकला

जिधर कहीं भी है ख़्वाबों का कारवाँ निकला क़दम-क़दम पे उधर एक इम्तिहाँ निकला उलझते क्यों न वहाँ हमसफ़र सब आपस में जहाँ भी रहनुमा रहजन का हमज़बाँ निकला …

ज़ेहन में और कोई डर नहीं रहने देता

ज़ेह्न में और कोई डर नहीं रहने देता शोर अन्दर का हमें घर नहीं रहने देता कोई ख़ुद्दार बचा ले तो बचा ले वरना पेट काँधों पे कोई सर …

ज़रा झाँक कर ख़ुद से बाहर तो देखो

ज़रा झाँक कर ख़ुद से बाहर तो देखो ज़माने से रिश्ता बना कर तो देखो ज़माना करे दोस्ती कैसे तुमसे ज़रा अपने हाथों में ख़ंजर तो देखो यही उनकी …

ज़ब्त किस इम्तहान तक पहुँचा

ज़ब्त किस इम्तहान तक पहुँचा मेरा ग़म भी बयान तक पहुँचा लौट आई परों में फिर जुम्बिश हौसला जब उड़ान तक पहुँचा अपनी आँखों में घर के ख़्वाब लिए …

जब भी अपने आपसे ग़द्दार हो जाते हैं लोग

जब भी अपने आपसे ग़द्दार हो जाते हैं लोग ज़िन्दगी के नाम पर धिक्कार हो जाते हैं लोग सत्य और ईमान के हिस्से में हैं गुमनामियाँ साज़िशें बुन कर …