Category: द्वारिका प्रसाद माहेश्वरी

हम सब सुमन एक उपवन के

एक हमारी धरती सबकी जिसकी मिट्टी में जन्मे हम मिली एक ही धूप हमें है सींचे गए एक जल से हम। पले हुए हैं झूल-झूल कर पलनों में हम …

वीर तुम बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो! धीर तुम बढ़े चलो! हाथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं वीर तुम बढ़े चलो! धीर …

यदि होता किन्नर नरेश मैं

यदि होता किन्नर नरेश मैं, राजमहल में रहता, सोने का सिंहासन होता, सिर पर मुकुट चमकता। बंदी जन गुण गाते रहते, दरवाजे पर मेरे, प्रतिदिन नौबत बजती रहती, संध्या …

मूलमंत्र

केवल मन के चाहे से ही मनचाही होती नहीं किसी की। बिना चले कब कहाँ हुई है मंज़िल पूरी यहाँ किसी की।। पर्वत की चोटी छूने को पर्वत पर …

माँ! यह वसंत ऋतुराज री!

आया लेकर नव साज री ! मह-मह-मह डाली महक रही कुहु-कुहु-कुहु कोयल कुहुक रही संदेश मधुर जगती को वह देती वसंत का आज री! माँ! यह वसंत ऋतुराज री! गुन-गुन-गुन …

उठो धरा के अमर सपूतो

उठो धरा के अमर सपूतो पुनः नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नया प्रात है, नई बात है, नई किरण है, …

चंदा मामा, आ

चंदा मामा, आ जाना, साथ मुझे कल ले जाना। कल से मेरी छुट्टी है ना आये तो कुट्टी है। चंदा मामा खाते लड्डू, आसमान की थाली में। लेकिन वे …

कौन सिखाता है चिडियों को

कौन सिखाता है चिड़ियों को चीं-चीं, चीं-चीं करना? कौन सिखाता फुदक-फुदक कर उनको चलना फिरना? कौन सिखाता फुर से उड़ना दाने चुग-चुग खाना? कौन सिखाता तिनके ला-ला कर घोंसले …

उठो धरा के अमर सपूतो

उठो धरा के अमर सपूतो पुनः नया निर्माण करो। जन-जन के जीवन में फिर से नई स्फूर्ति, नव प्राण भरो। नया प्रात है, नई बात है, नई किरण है, …

इतने ऊँचे उठो

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है। देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से जाति भेद की, धर्म-वेश की …

वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो

वीर तुम बढ़े चलो धीर तुम बढ़े चलो साथ में ध्वजा रहे बाल दल सजा रहे ध्वज कभी झुके नहीं दल कभी रुके नहीं सामने पहाड़ हो सिंह की …

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है

इतने ऊँचे उठो कि जितना उठा गगन है। देखो इस सारी दुनिया को एक दृष्टि से सिंचित करो धरा, समता की भाव वृष्टि से जाति भेद की, धर्म-वेश की …