Category: दीनू कश्यप

पहाड़-3

अब रात-बेरात काले अर्धचन्द्र-सा खड़ा रहता है वह उसकी गोद में टिमटिमाता है कुछ– बचे हुए पेड़ मायूसी में कहते हैं यह आग नहीं बंधुआ रोशनी है वरना पहाड़ …

पहाड़-2

चल रही हैं उस पर कुल्हाड़ियाँ– कुदालियाँ निरन्तर हमलावरों के बर-अक्स खड़ा होता है सीने को सख़्त किए वज्र चट्टान-सा लेकिन जब अपना ही कोई हाथ डाइनामाइट को लगाता …

पहाड़-1

अलस्सुबह सबसे पहले जाग जाता है हसरत से देखता है घाटी से उठता धुँआ आमदरफ़्त चौपायों की धीरे-धीरे क्वाली चढ़ते लकड़हारे के पाँवों को रपट जाता है चिल्लारू पर …

घोड़े-3

ताउम्र कुछ-न-कुछ ढोते हैं काठी पर चढ़ी सवारी को मालिक-सा अदब देते हैं वे सवारी चाहे मूर्ख हो या होशियार बीमार हो या तीमारदार वफ़ादार हो या गद्दार वे …

घोड़े-2

थोड़ी फ़ुरसत पाते ही घोड़े निकल पड़ते हैं हरी-भरी चरागाहों की तलाश में घोड़े जब भरपेट होते हैं तो हिनहिनाते हैं दोनों पाँवों पर खड़े हो जाते हैं डकार …

बच्चे कामगर

घरों से निकलते हैं अलस्सुबह निकाले गयों की तरह नन्हे मेहनती कामगर बच्चे हाथों में खिलौनों की जगह झूलती हैं बासी रोटी की मैली पोटलियाँ पैरों को घसीटते चलते …

मोलाइजे

दक्षिणी अफ़्रीका के युवा कवि मोलाइजे को फाँसी दिए जाने पर भाई तुम जीत गए हो जीत गई है तुम्हारी निर्भीक कविता तुम्हारी देह से टकराती चाबुक की आवाज़ …

युद्ध से लौटा पिता

बच्चे ख़ुश होते हैं महान‌ और सुरक्षित समझते हैं जब लौटता है युद्ध से उनका सिपाही पिता। बारी-बारी गोद में बैठते हैं वे पिता के ख़ुरदरे चेहरे को नन्हीं …