Category: दिनेश कुशवाह

कम नहीं हुआ है किसी पर मरने का मूल्य

बहुत छोटी हो गई है हमारी दुनिया बहुत कम हुई है हमारी दुनिया की दूरी पर हमारा भय कम नहीं हुआ है। अलंघ्य कुछ भी नहीं है हमारी दुनिया …

साँप

ज़िन्दगी बड़ी कठिन है बेटे अपने आप मेें बुदबुदाया बूढ़ा सँपेरा पिटारे में बन्द साँप से ज़िन्दगी तमाशा नहीं है पर तमाशा ज़रूरी चीज़ है ज़िन्दगी के लिए। भरम …

कबीर-रहीम और बदलाव-1

खरी खोटी कौन कहे कबीर! अब तो भला-बुरा कोई कुछ भी नहीं कहता इतने शालीन हो गए हैं लोग हज़ारों मील चलकर आई चिट्ठियाँ चिट्ठियाँ नहीं लगतीं इतने औपचारिक …

दाम्पत्य के लिए प्रार्थना

दिन भर इतने लोगों, इतनी चीज़ों और इतनी बातों का ख़याल रखना पड़ता है कि अपना ख़याल आते-आते थकान लग जाती है ऐसे में एक-दूसरे का ख़याल रखने के …

डॉ. विश्वनाथ त्रिपाठी का खाना

जिस चाव से विश्वनाथ जी खाते हैं पकवान उसी चाव से खाते हैं नमक और रोटी प्याज और मिर्च के साथ चटनी देखते ही उनका चोला मगन हो जाता …

खजुराहो में मूर्तियों के पयोधर

पत्थरों में कचनार के फूल खिले हैं इनकी तरफ़ देखते ही आँखों में रंग छा जाते हैं मानों ये चंचल नैन इन्हें जनमों से जानते थे। मानो हृदय ही …