Category: धूमिल

भेंट

कल सुदामा पाण्डे मिले थे हरहुआ बाजार में। खुश थे। बबूल के बन में बसन्त से खिले थे। फटकारते बोले, यार! खूब हो देखते हो और कतराने लगते हो, …

घर में वापसी

मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही तीर्थ-यात्रा की बस के दो पंचर पहिये हैं। पिता की आँखें… लोहसाँय-सी ठंडी शलाखें हैं। …

घर में वापसी

मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही तीर्थ-यात्रा की बस के दो पंचर पहिये हैं। पिता की आँखें… लोहसाँय-सी ठंडी शलाखें हैं। …

घर में वापसी

मेरे घर में पाँच जोड़ी आँखें हैं माँ की आँखें पड़ाव से पहले ही तीर्थ-यात्रा की बस के दो पंचर पहिये हैं। पिता की आँखें… लोहसाँय-सी ठंडी शलाखें हैं। …

गाँव

मूत और गोबर की सारी गंध उठाए हवा बैल के सूजे कंधे से टकराए खाल उतारी हुई भेड़-सी पसरी छाया नीम पेड़ की। डॉय-डॉय करते डॉगर के सींगों में …

किस्सा जनतंत्र

करछुल… बटलोही से बतियाती है और चिमटा तवे से मचलता है चूल्हा कुछ नहीं बोलता चुपचाप जलता है और जलता रहता है औरत… गवें गवें उठती है…गगरी में हाथ …

उसके बारे में

पता नहीं कितनी रिक्तता थी- जो भी मुझमे होकर गुजरा -रीत गया पता नहीं कितना अन्धकार था मुझमे मैं सारी उम्र चमकने की कोशिश में बीत गया भलमनसाहत और …