Category: ध्रुव शुक्ल

तुम हर बार आती हो एकांत में

तुम हर बार आती हो एकांत में जैसे पानी में उठती है तरंग जैसे घोंसले में लौटती है चिड़िया तुम नदी की धार होकर मुझे गुदगुदाती हो मैं चित्र …

सूख गई जो यहाँ कभी थी एक नदी

एक वृक्ष था कभी यहाँ जो सूख गया बरन-बरन के पंछी उस पर बसते थे भेद-भव से भरी हुई इस बस्ती में आपस में विश्वास नहीं करता कोई सूख …

क्या लौटना संभव नहीं शान्तनु !

माँ की आंखों को रोशनी की धुंध से भरतीं भागम-भाग के भय से भरतीं पिता को प्रतीक्षा को बढ़ातीं दूर ले जातीं घर से मौत की मोटर साइकिलें न …

पूरा घर बिखर गया है शान्तनु

तुम्हें बीननी थीं हमारी अस्थियाँ अब हम ही चुन रहे हैं तुम्हारी पूरा घर बिखर गया है शान्तनु ! छोटी-सी पोटली में अपने सपनों की राख लिए पिता बैठे हैं …

तुम किसके सपने में चले गये शान्तनु !

आँखों में भर आया है इतना पानी डूबते ही जा रहे हैं सारे सपने ठिठकी हुई हैं पूरे कुटुम्ब की पलकें ढह रहा है हमारे धीरज का पुल पटरी …

हमने ही रखा था तुम्हारा नाम- शान्तनु

तुम्हें पुकारने के लिए हमने ही रखा था तुम्हारा नाम- शान्तनु ! अब तुम वहाँ चले गए जहाँ हमारी आवाज़ नहीं जाती अगर तुम हमारी ओर लौट सकते तो हम …