Category: धर्मेन्द्र कुमार निवातियाँ

भूमिका—डी. के. निवातिया

आजकल प्रत्येक कार्य में प्रतियोगिता हो गयी भूमिका अहम् इसमें सोशल साइट की हो गयी परिवर्तन और विकास की ये कैसी लहर चली वास्तविकता क्षेत्र की जिसमे कही गुम …

🙏🙏रचना को प्रतियोगिता में विजयी बनाने के लिए नम्र निवेदन 🙏🙏

मुझको-मेरा-हक-दो  बेटी शीर्षक के अंतर्गत  मेरे द्वारा रचित यह यह रचना प्रतियोगिता में शामिल है अत  आप और आप के सभी साथियो से नम्र निवेदन है की इस रचना …

आज का नवयुवक—डी. के. निवातिया

आज का नवयुवक अजीब हाल में दिखता है आज का नवयुवक जागा है मगर कुछ खोया खोया सा हँसता भी है पर कुछ रोया-रोया सा जीवन संघर्ष की इस …

प्रथम किरण—डी. के . निवातिया

दरख्तों से पत्तियो तक लुढ़कती शबनम सिमटती पुष्प कपोल ! निशा छिपती नजर आये, ज्यो रवि की प्रथम किरण से मिले भोर !! ! ! ! डी. के . …

सुनो ……शेरो शायरी—-डी. के निवातिया

सुनो, कुछ नही है तो यादो में आते क्यों हो पल – पल ख्यालो में आकर सताते क्यों हो न किस्मत अपनी, न जिगर तुममे इतना फिर सपने दीद …

तैयार हो जाओ—डी. के. निवातिया

तैयार हो जाओ …. आया है मौसम चुनावी बरसात का, बरसाती मेंढक अब तैयार हो जाओ चल निकलेगी अब तुम्हारी लाटरी थाम झोला छतरी  तैयार हो जाओ !! जम …

अमीरी-गरीबी—ज़िन्दगी पर कविता—डी के निवातिया

अमीरी-गरीबी बहस छिड़ गयी एक दिन अमीरी और गरीबी में !! नाक उठा ‘अमीरी’ बोली बड़े शान से काम बन जाते है सिर्फ मेरे नाम से हर किसी की …

गुमसुम—डी. के. निवातिया

कुछ तो बात है जो गुमसुम हो, राज-ए-दिल कभी खोला करो, दिल ऐ हालात नही तो न सही, अपने लबो से तो कुछ बोला करो… !! ! ! डी. …

नूतन वर्ष मनाये—डी के निवातिया

आओ मिलकर ऐसे नूतन वर्ष मनाये किसी उदास चेहरे पर मुस्कान लाये करे शपथ प्रेम व् सद्भाव अपनाने की हर गुलशन को आदमियत से महकाये । आओ मिलकर ऐसे …

धीरे-धीरे — डी के निवातिया

भोर की चादर से निकलकर शाम की और बढ़ रही है जिंदगी धीरे धीरे  ! योवन से बिजली सी गरजकर बरसते बादल सी ढल रही है जिंदगी धीरे धीरे …

मुस्कान—कविता—डी. के. निवातिया

मुस्कान, मात्र एक नाम या शब्द नही ये पहचान है……………. !! किसी से प्रीत की मिली हुई जीत की चाहत के गीत की मिलन पे मीत की !! ! …

कुछ पल मुस्कुराये होते—डी के निवातिया

तुम अगर मेरी जिंदगी में आये होते तो हम भी कुछ पल मुस्कुराये होते !! न रहते जिंदगी में तुम भी यूँ तन्हा न अकेले में हमने आँसू बहाये …

नशा क्या होता है — डी के निवातिया

हमने न शौक फरमाया था जिन्दगी में कभी मयकदे जाने का एक बार तेरी आँखों से पी तो समझ आया नशा क्या होता है !!  

अल्हड़ बेगाना—डी. के. निवातिया

न जगाओ मेरे जमीर को, मुझे नासमझ नादाँ ही रहने दो ! मैं ठहरा अल्हड़ बेगाना, जो कहे ज़माना बेशक कहने दो !! ! इंसानियत का मोल नही यंहा …

रहम-ओ-करम—डी के निवातिया

खेल तो सारा का सारा खुदा के रहम-ओ-करम का है ! वरना क्या तुझ में रखा है, और  क्या मुझ में रखा है !! ! ! ! रचनाकर ::-   …

मयखाने में क्या नशा रखा है—डी के निवातिया

लफ्जो की आइस क्यूब से मुहब्बत का जाम सजा रखा है । हमने तो तेरे लिये इन आँखों में ही मयकदा बना रखा है । पीना है तो हमारी …

साँसों को डोर —–डी. के. निवातिया

कुछ मीठी सी यादो संग, धुंधले से पलों में खुद को समेट रखा है इनमे ही बंधी है साँसों को डोर, और इनके सिवा जिंदगी में क्या रखा है …

स्याही में खून—डी. के. निवातिया

आज फिर कलम के निकले है आंसू जिनसे जमीन पर एक तस्वीर उभर आई है। जरुर हुई है सरहद पे कोई नापाक हरकत तभी स्याही में खून की झलक …

सौगात —डी. के. निवातिया

आयी फिर याद भूली बात की तरह ! गुजरी है लश्कर-ऐ-बारात की तरह !! ! कितने बदल गये यार सब अपने वक़्त – बेवक़्त हालात की तरह ! ! …

तेरी यादे—शेर—डी. के. निवातिया

मेरे पास कौन सा कोई जादू या कमाल रखा है, ये बस तेरी यादे है जिन्होंने मुझे संभाल रखा है !! ! ! ! डी. के. निवातिया __________!!!

दे कलम को धार — ग़ज़ल-नज्म — डी. के. निवातियाँ

दे कलम को धार अब तलवार बनाना होगा ! भर लफ्जो की हुंकार हथियार बनाना होगा !! जब बात बने ना मान मुनव्वल से, जान लो अपने डंडे की …