Category: धर्मेन्द्र कुमार निवातियाँ

बुलबुल-ऐ-चमन – डी के निवातिया

बुलबुल-ऐ-चमन * कफ़स-ऐ-क़ज़ा में कैद बुलबुल-ऐ-चमन अपना है बनाएंगे जन्नत-ऐ-शहर इसे लगे बस ये सपना है फ़िक्र किसे मशरूफ सब अपनी बिसात बिछाने में नियत में ,राम-राम जपना पराया …

ज़रा खुलने तो दो — डी के निवातिया

ज़रा खुलने तो दो *** शेर सारे पढ़े जायेंगे तुम्हारे मतलब के ज़रा खुलने तो दो बाते तमाम होंगी वफ़ा संग बेवफाई की ज़रा घुलने तो दो !! हर …

बचाना भी है — डी के निवातिया

आँगन — फूलों और कलियों से आँगन सजाना भी है, कीचड और काँटों से दामन बचाना भी है, महकेगा चमन-ऐ- गुलिस्तां अपना तभी, हर मौसम की गर्दिश से इसे …

प्रत्याशा – साझा काव्यसंग्रह

आप सभी आदरणीय साथियो को यह बताते हुए अति प्रसन्नता हो रही है की हाल ही में प्रकशित हमारी पुस्तक शीर्षक      साझा काव्य संग्रह “बुक बज़ुका , …

यथासंभव — डी के निवातिया

यथासंभव — रक्षक,दक्षक,शिक्षक,भिक्षक सब दाम में बिकता है खरीददार अगर पक्का है तो सब कुछ मिलता है कौन कहता है सच कभी झूठा नहीं हो सकता कलयुग में तो …

अमर रहेगा नाम तुम्हारा — डी के निवातिया

अमर रहेगा नाम तुम्हारा *** तुम योग्य लफ्ज़ नहीं पास मेरे, कैसे करुँ गुणगान तुम्हारा राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह, कितना है अहसान तुम्हारा देश प्रेम के सूचक थे तुम …

धैर्य की परीक्षा – डी के निवातिया

    धैर्य की परीक्षा *** अब न खाली हो किसी माँ की गोद, कोई लाल अब न फ़ना हो कब तक देनी होगी धैर्य की परीक्षा, अब कोई …

बेरुखी -डी के निवातिया

बेरुखी *** करके बेवफाई, खुद को, नज़रें मिलाने के काबिल समझते हो बात बात पर देकर दुहाई मुहब्बत कि, हम ही से उलझते हो कहाँ से सीखा हुनर, इश्क …

मंजर – डी के निवातिया

मंजर *** हर मंजर से गुजर रहे है कुछ लोग, सियासत में अपना रूतबा जमाने को ! न जाने कितने गुलाब मसल डाले, फकत अपने नाम का गुल खिलाने …

डी के निवातिया परिवार की ओर से आप सब को होली की हार्दिक शुभकामनाएं

आया है पावन त्यौहार फिर से होली का गले लगाकर करो तिलक चंदन-रोली का राग द्वेष मिटाकर प्रेम का अलख जगा लो हर्षित मन सजा रहे अपनों संग रंगोली …

सगा – डी के निवातिया

सगा *** वो न मेरा, न तेरा, न इसका, न उसका सगा था सैलाब हैवानियत का उसके जहन में जगा था ! परवाह कब थी उसने दुनिया में इंसानियत …

तेरे नाम – डी के निवातिया

तेरे नाम — सोचता हूँ एक ग़ज़ल तेरे नाम लिख दूँ राज़-ऐ-दिल मुहब्बत के तमाम लिख दूँ उठे गर नजरे तो रोशन ऐ आफताब कहें ज़रा झुके जो पलकें, …

नूर हूँ मै – डी के निवातिया

नूर हूँ मै @ तेरे मुखमंडल की आभा से प्रज्वलित होता दीप हूँ मैं तेरे ही आशीर्वचनो से फलीभूत होता आशीष हूँ मै तुम कारक, कारण तुम ही तुम …

स्वेटर माँ के हाथ का – डी के निवातिया

स्वेटर माँ के हाथ का — सर्दी से बचने के लिए, आज लबादों से लदा हूँ, महंगे सूट पहनकर ! मगर वो गर्माहट नहीं मिलती, जो माँ के हाथ …

हाँ मैं वही बसंत हूँ – डी के निवातिया

हाँ मैं वही बसंत हूँ …. =+= जो कभी नई कोंपलो में दिखता था कलियों में फूल बनकर खिलता था हवाओ संग ख़ुशबू लिए फिरता था चेहरों पे नई …

हम ही दुष्ट हो गए – डी के निवातिया

हम ही दुष्ट हो गए *** यार तमाम अपने अब रुष्ट हो गए करके माल हज़म हष्ट-पुष्ट हो गए हमने उन्हें ज़रा सा क्या रोका टोका नजरो में उनकी …

अफ़सोस न कर – डी के निवातिया

अफ़सोस न कर *** मेरे वतन के हिस्से ये सौगात हर बार मिली है ! कभी गूंगो की कभी बहरो की सरकार मिली है !! किसी में हुनर सुनने …

काहे भरमाये — डी के निवातिया

काहे भरमाये *** काहे भरमाये, बन्दे काहे भरमाये नवयुग का ये मेला है बस कुछ पल का खेला है आनी जानी दुनिया के रंग मंच पे नहीं तू अकेला …

यशोदा तेरा ललन बड़ा निराला – डी के निवातिया

यशोदा तेरा ललन बड़ा निराला *** हलधर का भाई, नन्द का लाला, यशोदा तेरा ललन बड़ा निराला, बड़ा निराला, मैया बड़ा निराला, यशोदा तेरा ललन बड़ा निराला !! कमर …

शब्द विवेचन- मेरा आईना- प्रेम

शब्द विवेचन – “प्रेम”   शब्द माला के “प” वर्ग के प्रथम और व्यंजन माला के इक्कीस वे अक्षर के साथ स्वर संयोजन के बना “अढाई अक्षर” का शब्द …

शत शत नमन — डी के निवातिया

जय जवान – जय किसान के उद्घोषक भारत रत्न श्री लाल बहादुर शास्त्री जी की पुण्य तिथि पर शत शत नमन २ अक्तू १९०४ – ११ जनवरी १९६६ *** …

गुनगुनी सी धूप — डी के निवातिया

गुनगुनी सी धूप शरद ऋतू में पीली सुनहरी गुनगुनी सी धूप कुहासे की श्वेत चादर में लिपटे रवि का रूप फुर्रफुराती कलँगी में डाल-डाल फुदकते पंछी अच्छा लगे अलसायी …

शिक्षा ही वरदान है – डी के निवातिया

शिक्षा ही वरदान है *** कल ही की बात है गावं से मैं गुज़र रहा था बुजर्गो की जमात से चौपाल जगमगा रहा था चर्चा बड़ी आम चली थी …