Category: धर्मेन्द्र कुमार निवातियाँ

तुम न समझे – डी के निवातिया

  तुम न समझे *** बहुत बुझाई पहेलियाँ, मगर कोई सवाल तुम न समझे ! समझ गई दुनिया सारी कितने हुए बवाल तुम न समझे !! टूट गए हम …

ज्ञान बांच रहा है – डी के निवातिया

ज्ञान बांच रहा है +++ जिसे देखो आज वो ही ज्ञान बांच रहा है बच्चा बूढ़ा और जवान संग नाच रहा है धर्म-कर्म की गंगा बह रही है कलयुग …

प्रेम की लौ – डी. के. निवातिया

कोई कली जब फूल बनकर महक उठती है, उसे देख तबियत भंवरे कि चहक उठती है, महकने लगता है अहले चमन खुशबू से, सूने दिल मे भी प्रेम की …

भूख – डी के निवातिया

भूख *** ये भूख जाने कैसी है, मिटती नहीं तन-मन को तृप्ति, मिलती नहीं जो जितना अधिक पा जाता है चाहत फिर दोगुना बढ़ जाता है कोई दो जून …

दिल और दिमाग – डी के निवातिया

दिल और दिमाग कह लेने दो दिल की बाते, मिला आज मौका है दिल का नहीं भरोसा, अक्सर खा जाता धोखा है दिल और दिमाग कब देतें है साथ …

गर्मियों की छुट्टियां- बाल कविता – डी के निवातिया

गर्मियों की छुट्टियां +++ मई जून का जब महीना आया बाल गोपालो का मन हर्षाया पढ़ाई-लिखाई से मनवा रूठा टीचर की डाँट से पीछा छूटा !!    अब सुबह …

मै भारत माता बोल रही हूँ – डी के निवातिया

मै भारत माता बोल रही हूँ *** जंजीरों में जकड़ी हूँ मै भारत माता बोल रही हूँ ह्रदय में उठती पीड़ा चन्द शब्दों में खोल रही हूँ ।। कोई …

आँचल में झांकना होगा – डी के निवातिया

आँचल में झांकना होगा * जमाने पे ऊँगली उठाने से पहले जांचना होगा हमको पहले खुद के आँचल में झांकना होगा गुनहेगारो के गुनाह पर नज़र डालने से पहले …

ज़लवा दिखाओ तो जाने – डी के निवातिया

ज़लवा दिखाओ तो जाने *** आज भी पहले सा मुस्कराओ तो जाने फिर से वही ज़लवा दिखाओ तो जाने !! मुहब्बत को तरस गयी है प्यासी निगाहें फिर उसी …

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) – डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – तीन) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

ये कौन सा सभ्य समाज है (2)- डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – दो) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: लोक-लाज …

ख्यालों के दरमियाँ – डी के निवातिया

  ख्यालों के दरमियाँ *** टूटे-फूटे शब्दों के खंगर जोड़-जोड़ कर ज़ज़्बातो के पत्थरों को तोड़-तोड़ कर बनाया था एक मकाँ ख्यालों के दरमियाँ गुम गए उसमे सपनो की …

ये कौन सा सभ्य समाज है (1)- डी के निवातिया

ये कौन सा सभ्य समाज है (भाग – एक ) *** ये कौन सा सभ्य समाज है, ये किस सदी का राज़ है मानव का मानव दुश्मन, लुप्त प्राय: …

मज़दूर दिवस – डी के निवातिया

मज़दूर दिवस मज़दूर दिवस पहचान बना है श्रम बलिदान का कर्म करना ही पहला धर्म हो हर एक इंसान का न जाने क्यों हीन दृष्टि से देखा जाता है …

कितना गम है – डी के निवातिया

कितना गम है *** दिल में दर्द उठता है,जुबाँ खामोश, आँखे नम है मत पूछो यारो हमसे, जिंदगी में कितना गम है किसी का पसीना भी बहे, तो खबर …

इंसानियत की सीमा – डी के निवातिया

इंसानियत की सीमा — सोया हुआ है सिंह, सियार दहाड़ मार रहा है छल-कपट की लड़ाई में शूरवीर हार रहा है जाने किस करवट बैठेगा हैवानियत का ऊँट इंसानियत …

बुलबुल-ऐ-चमन – डी के निवातिया

बुलबुल-ऐ-चमन * कफ़स-ऐ-क़ज़ा में कैद बुलबुल-ऐ-चमन अपना है बनाएंगे जन्नत-ऐ-शहर इसे लगे बस ये सपना है फ़िक्र किसे मशरूफ सब अपनी बिसात बिछाने में नियत में ,राम-राम जपना पराया …

ज़रा खुलने तो दो — डी के निवातिया

ज़रा खुलने तो दो *** शेर सारे पढ़े जायेंगे तुम्हारे मतलब के ज़रा खुलने तो दो बाते तमाम होंगी वफ़ा संग बेवफाई की ज़रा घुलने तो दो !! हर …

बचाना भी है — डी के निवातिया

आँगन — फूलों और कलियों से आँगन सजाना भी है, कीचड और काँटों से दामन बचाना भी है, महकेगा चमन-ऐ- गुलिस्तां अपना तभी, हर मौसम की गर्दिश से इसे …

प्रत्याशा – साझा काव्यसंग्रह

आप सभी आदरणीय साथियो को यह बताते हुए अति प्रसन्नता हो रही है की हाल ही में प्रकशित हमारी पुस्तक शीर्षक      साझा काव्य संग्रह “बुक बज़ुका , …

यथासंभव — डी के निवातिया

यथासंभव — रक्षक,दक्षक,शिक्षक,भिक्षक सब दाम में बिकता है खरीददार अगर पक्का है तो सब कुछ मिलता है कौन कहता है सच कभी झूठा नहीं हो सकता कलयुग में तो …

अमर रहेगा नाम तुम्हारा — डी के निवातिया

अमर रहेगा नाम तुम्हारा *** तुम योग्य लफ्ज़ नहीं पास मेरे, कैसे करुँ गुणगान तुम्हारा राजगुरु, सुखदेव, भगत सिंह, कितना है अहसान तुम्हारा देश प्रेम के सूचक थे तुम …

धैर्य की परीक्षा – डी के निवातिया

    धैर्य की परीक्षा *** अब न खाली हो किसी माँ की गोद, कोई लाल अब न फ़ना हो कब तक देनी होगी धैर्य की परीक्षा, अब कोई …