Category: धनंजय सिंह

स्वप्निल आकांक्षा

स्वप्न की झील में तैरता मन का यह सुकोमल कमल चंद्रिका-स्नात मधु रात में हो हमारा-तुम्हारा मिलन दूर जैसे क्षितिज के परे झुक रहा हो धरा पर गगन घास …

लौटना पड़ेगा फिर-फिर घर

घर की देहरी पर छूट गए संवाद याद यों आएँगे यात्राएँ छोड़ बीच में ही लौटना पड़ेगा फिर-फिर घर यह आँगन धन्यवाद देकर मन ही मन यों मुस्काएगा यात्राएँ …

बेच दिए हैं मीठे सपने

हमने तो अनुभव के हाथ बेच दिए हैं मीठे सपने सूरज के छिपने के बाद हुए बहुत मौलिक अनुवाद सुबह लिखे पृष्ठ लगे छपने स्वर्ण कलश हाथ से छुटे …

बहुत दूर डूबी पदचाप

गीतों के मधुमय आलाप यादों में जड़े रह गए बहुत दूर डूबी पदचाप चौराहे पड़े रह गए देखभाल लाल-हरी बत्तियाँ तुमने सब रास्ते चुने झरने को झरी बहुत पत्तियाँ …

ध्वन्यालोकी प्रियंवदाएँ

आकुलता को नए-नए आयाम दे दिए मन के आसपास महकाकर मधु-गंधाएँ एक शब्द के लिए गीत का ताना-बाना कौन बुनेगा बुन भी लें तो मनोयोग से रुदन हमारा कौन …

झाँकते हैं फिर नदी में पेड़

झाँकते हैं फिर नदी में पेड़ पानी थरथराता है यह नुकीले पत्थरों का तल काटता है धार को प्रतिपल और तट की बाँबियों को छेड़ फिर कोई संपेरा गुनगुनाता …

जंगल उग आए

भाव-विहग उड़ इधर-उधर दुख दाने चुग आए मन पर घनी वनस्पतियों के जंगल उग आए चीते-जैसे घात लगाए कई कुटिलताएँ मुग्ध हिरन की आँखों का संवेदन समझाएँ किस-किस बियाबान …

कुछ क्षणिकाएँ

दायित्व पंखों में बांधकर पहाड़ उड़ने को कह दिया गया। ध्वजारोहण शौर्य शांति और समृध्दि को काले पहिए से बांधकर बाँस पर लटका दिया गया है मेरे देश में! …

कक्षा से भटका हुआ उपग्रह हूँ

मैं धरा-गगन दोनों से छूट गया संपर्क संचरण-ध्रुव से टूट गया कक्षा से भटका हुआ उपग्रह हूँ गिरना तो निश्चित है लेकिन कब, कहाँ, कौन जाने उल्काओं से टकराकर …