Category: देवेन्द्र शर्मा `इन्द्र’

मुसलसल रंज-ओ-ग़म सहने का ख़ूगर जो हुआ यारो

मुसलसल रंजो-ग़म सहने का ख़ूगर जो हुआ यारो ख़ुशी दो लम्हों की देकर उसे बेमौत मत मारो मेरी राहों मे आकर क्यों मेरे पाँवो में चुभते हो मुहाफ़िज़ बनके …

डगर में साथ-साथ हैं , न घर में तुम, न घर में हम

डगर में साथ-साथ हैं , न घर में तुम, न घर में हम न फिर भी कोई गुफ़्तगू सफ़र में तुम, सफ़र में हम अलग-अलग हैं बस्तियाँ , जुदा-जुदा …

जब भी सूरज को हथेली पे लिया है मैंने

जब भी सूरज को हथेली पर लिया है मैंने सारी दुनिया को अँधेरा ही दिया है मैंने मेरी मंशा थी कि सड़कों को नदी में बदलूँ प्यास के वक़्त …

ख़ुदा की बन्दगी मैंने न सुब्‍ह की न शाम की

ख़ुदा की बन्दगी मैंने न सुब्‍ह की न शाम की तुम्हें तलाशते हुए ये ज़िन्दगी तमाम की नज़र मिला के एक पल वो शख़्स आगे बढ़ गया न ख़ैरियत …

क़लम ये हाथ में मैंने न गर लिया होता

क़लम ये हाथ में मैंने न गर लिया होता तो अंजुमन में तुम्हारी अदब का कया होता ख़ुदापरस्तों की मस्ज़िद में बन्दगी के लिए न होते हम तो कोई …

आस्ताँ सो गए खिड़कियाँ सो गईं

आस्ताँ सो गए खिड़कियाँ सो गईं चश्म-स-नम सो गए, सिसकियाँ सो गईं रातभर बम बरसते रहे मौत के सरहदों पर बसी बस्तियाँ सो गईं कुछ हवा ज़ह्र में डूबी …

अपने में लाजवाब है कहते जिसे ग़ज़ल

अपने में लाजवाब है कहते जिसे ग़ज़ल सहरा में इक सराब है कहते जिसे ग़ज़ल अब मकतबों या मयक़दों में फ़र्क़ क्या करें लफ़्ज़ों में इक शराब है कहते …

छ्न्द प्रसंग नहीं हैं

हम जीवन के महाकाव्य हैं केवल छ्न्द प्रसंग नहीं हैं। कंकड़-पत्थर की धरती है अपने तो पाँवों के नीचे हम कब कहते बन्धु! बिछाओ स्वागत में मखमली गलीचे रेती …

काफिला आवाज का

राह में आँखें बिछाये किसलिए बैठा अब यहाँ कोई न आयेगा. धूप का रथ दूर आगे बढ़ गया सिर्फ पहियों की लकीरें रह गयी थी इमारत एक सागर तीर …

आँखों में रेत प्यास

फूलों के बिस्तर पर नींद क्यों नहीं आती, चलो, कहीं सूली पर, सेज हम बिछाएँ । दूर-दूर तक कोई नदी नहीं दिखती है । हिरणों की आँखों में रेत …