Category: देवेन्द्र रिणवा

याद नहीं आता

जैसे याद नहीं आता कि कब पहनी थी अपनी सबसे प्यारी कमीज़ आख़ि़री बार कि क्या हुआ उसका हश्र? साइकिल पोंछने का कपडा बनी छीजती रही मसोता बन किसी …

परछाईं

अन्धेरे से बनी होती है इसकी देह जितना तेज़ प्रकाश उतनी गहरी परछाईं इतनी डरपोक और शातिर कि आँख नहीं मिलाती ठीक पीछे खड़ी होती है दुबक जाती है …

कुरेदा नहीं जाता जब अलाव

दो या तीन लोग जमा करते हैं घास-फूस, रद्दी कागज़, टूटे खोखे, गत्ते, छिलपे घिसे टायर और तमाम फालतू चीज़ें जलाया जाता है अलाव एक-एक कर जुटते हैं लोग …